54 सालों से बांके बिहारी का तहखाना था खाली! आखिर कहां गए सोने-चांदी, हीरे जवाहरात? जानिए क्या है इसके पीछे की कहानी

वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर का रहस्यमय खजाना आखिर कहां गायब हो गया? 54 साल बाद जब तहखाना खोला गया तो जो सामने आया, उसने सभी को चौंका दिया। क्या सच में बिहारीजी का अनमोल खजाना लापता हो चुका है? जानिए इस रहस्य की असली कहानी...

Published by Shivani Singh

वृंदावन की गलियों में जब-जब ठाकुर बांके बिहारी का नाम लिया जाता है, श्रद्धा की लहरें दौड़ पड़ती हैं. पर इस बार बात सिर्फ भक्ति की नहीं, एक रहस्य की भी है. उस अनमोल खजाने की, जिसके बारे में कहा जाता था कि वह हीरे, मोती और सोने-चाँदी से भरा पड़ा है. दशकों तक बंद रहने के बाद जब मंदिर का तहखाना आखिर खोला गया, तो जो सच्चाई सामने आई, उसने सभी को हैरान कर दिया. आखिर वो खजाना कहाँ गया, जिसे लेकर कहानियाँ पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं? आइए जानते हैं उस रहस्यमय खजाने की परतें, जो आज भी वृंदावन की हवा में तैर रही हैं.

स्थानीय निवासियों के चौंकाने वाले खुलासे

स्थानीय निवासी नवीन गौतम ने लोकल 18 से बातचीत के दौरान कई खुलासे किए. उन्होंने बताया कि 1970 में हुई चोरियों में मंदिर के दो गोस्वामी शामिल थे. उन्होंने अमूल्य खजाना चुराया था. 1970 तक मंदिर का खजाना खाली हो चुका था. सभी जानते हैं कि भगवान बांके बिहारी मंदिर के गोस्वामी आपराधिक प्रवृत्ति के थे. उनमें से एक की अटला चुंगी में बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. यह हत्या भी खजाने को लेकर की गई थी.
बिहारीजी के खजाने में दो बार चोरी हुई.

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54 साल बाद खुला बांके बिहारी मंदिर का तहखाना

वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर का खजाना भले ही 54 साल बाद खुला हो, लेकिन ठाकुरजी के खजाने से चोर खुलने से पहले ही कीमती रत्न चुरा ले गए. मंदिर के गोस्वामी ने चोरी की जानकारी दी. इतिहासकार और मंदिर के पुजारी प्रह्लाद गोस्वामी ने बताया कि मंदिर निर्माण के समय पूजा-अर्चना के बाद खजाने को स्थापित किया गया था. इसके बाद, ठाकुरजी को अर्पित किया जाने वाला पन्ना मोर हार, अनेक आभूषणों, चाँदी और सोने के सिक्कों और भरतपुर, करौली और ग्वालियर जैसी रियासतों के सेवा-पत्रों के साथ, भी वहाँ रखा गया.

चोरी के बाद, गोस्वामी समुदाय ने तहखाने के मुख्य द्वार को बंद कर दिया और सामान रखने के लिए एक छोटा सा द्वार बना दिया. 1971 में, एक अदालती आदेश के बाद, खजाने के द्वार पर लगा ताला बंद कर दिया गया, जो आज भी लगा हुआ है. 2002 में, कई सेवकों ने तत्कालीन मंदिर रिसीवर, वीरेंद्र कुमार त्यागी को एक हस्ताक्षरित ज्ञापन सौंपकर खजाने को फिर से खोलने का अनुरोध किया. 2004 में, मंदिर प्रशासन ने गोस्वामी के अनुरोध पर खजाने को पुनः खोलने के लिए कानूनी प्रयास किये, लेकिन वे प्रयास असफल रहे.

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