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Nepal में राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठा सकता है चीन, भारत की क्या होगी चुनौतियां?

नेपाल में सोशल मीडिया बैन के विरोध से शुरू हुआ आंदोलन अब भ्रष्टाचार और चीन समर्थक सरकारों के खिलाफ जनता के गुस्से में बदल चुका है। बढ़ता चीनी प्रभाव भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौतियाँ खड़ी कर सकता है।

Published by Shivani Singh

Nepal Social Media Ban: नेपाल एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहा है, लेकिन इस बार मामला सिर्फ़ सोशल मीडिया पर प्रतिबंध का नहीं है। यह विरोध-प्रदर्शन एक गहरी बेचैनी का संकेत भी है, जो नेपाल की युवा पीढ़ी के दिलों में पिछले कई वर्षों से पल रही है। भ्रष्टाचार, बढ़ता कर्ज़, शासन में पारदर्शिता की कमी और वामपंथी सरकारों की चीनपरस्ती ने जनता का भरोसा तोड़ा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन हालातों का फ़ायदा उठाकर चीन नेपाल को भी अपने ‘कर्ज़-जाल’ में जकड़ना चाहता है, जैसा कि उसने पाकिस्तान, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों के साथ किया है? 

काठमांडू की सड़कों पर चीनी नेताओं के पोस्टर फाड़े जा रहे हैं, राजशाही की वापसी की माँग हो रही है, और सरकार की चुप्पी नए संकट की आहट दे रही है। ऐसे में भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के लिए यह जानना ज़रूरी हो गया है कि नेपाल में उठता यह जन आंदोलन सिर्फ़ सरकार के ख़िलाफ़ है, या फिर किसी बड़े भू-राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत?

सड़कों पर हंगामा, चीनी नेताओं के फाड़े जा रहे पोस्टर

इससे पहले भी नेपाल में युवाओं ने राजशाही की वापसी की माँग को लेकर जमकर प्रदर्शन किया था। तब चीन समर्थक सरकारों के खिलाफ जनता का गुस्सा सड़कों पर साफ़ दिखाई दे रहा था। ख़ास बात यह थी कि उस समय प्रदर्शनकारियों ने पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र शाह के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पोस्टर भी लहराए थे।

आज काठमांडू में चीनी नेताओं के पोस्टर फाड़े जाने से साफ़ है कि जनता अब खुलकर चीन के हस्तक्षेप और वामपंथी सरकारों के ख़िलाफ़ सामने आ रही है।

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पुरे नेपाल में फैला आंदोलन

काठमांडू के अलावा कई शहरों में हालात बेकाबू हैं। प्रधानमंत्री के गृह ज़िले झाका में कर्फ्यू लगा दिया गया है। पश्चिमी मटन और गिरबन में भी रात 9 बजे से कर्फ्यू लगा दिया गया है। आपको बताते चलें कि बिठवाल और भरवा जैसे शहरों में दोपहर से ही कर्फ्यू लगा दिया गया है। उथारी में गोलीबारी की घटना भी हुई और कई प्रदर्शनकारी बुरी तरह घायल हो गए।

यह आंदोलन पूरे नेपाल में तेज़ी से फैल रहा है। अभी तक सरकार ने सिर्फ़ इतना कहा है कि हिंसा की जाँच के लिए एक समिति बनाई जाएगी। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध हटाने के बारे में कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया गया है।

चीन के बढ़ते प्रभाव से भारत के लिए चुनौती

बता दें कि चीन दक्षिण एशिया में अपनी पकड़ लगातार मज़बूत कर रहा है। पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में चीन का प्रभाव पहले से ही है। श्रीलंका अपना विदेशी कर्ज़ चुकाने में असमर्थ हो गया है। मालदीव को अपने सार्वजनिक कर्ज़ का 20 प्रतिशत चीन को चुकाना है। वहीँ पाकिस्तान चीन का उपनिवेश बनता जा रहा है। चीन बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता का फ़ायदा उठा रहा है और अब कह सकते हैं कि नेपाल भी इसी जाल में फँसता दिख रहा है।

आपको बताते चलें कि अगर नेपाल में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमज़ोर हो जाती हैं, तो यह भारत की उत्तरी सीमाओं पर चीनी प्रभाव के विस्तार को और बढ़ाएगा और मजबुत करेगा। यह स्थिति भारत की सुरक्षा, व्यापारिक हितों और कूटनीतिक प्रभाव के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है। ऐसे में भारत के लिए ज़रूरी हो जाता है कि वह नेपाल के साथ अपने राजनीतिक संबंधों को मज़बूत करे और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करे।

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