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कब है वैशाख माह की पहली एकादशी? जानें व्रत, दान और पूजा का सही समय; इन राशियों को मिलेगा लाभ

Varuthini Ekadashi 2026: वरूथिनी एकादशी धार्मिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है. साथ ही यह जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का भी अवसर देती हैं.

By: Preeti Rajput | Published: April 6, 2026 7:54:47 AM IST



Varuthini Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी का काफी विशेष महत्व माना जाता है. हर महीने आने वाली एकादशियां भगवान विष्णु को समर्पित होती है. वैशाख माह की पहली एकादशी को वरूथिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. यह एकादशी पाप से मुक्ति और सुख-समृद्धि वाली मानी जाती है. माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं. साथ ही व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है. 

तिथि और शुभ मुहूर्त

  • एकादशी तिथि शुरू: 13 अप्रैल, रात 1:16 बजे (व्रत वाला दिन)
  • एकादशी तिथि समाप्त: 14 अप्रैल, रात 1:08 बजे

पूजा का शुभ मुहूर्त 

  • पहला मुहूर्त: सुबह 5:58 से 7:34 बजे तक
  • दूसरा मुहूर्त: सुबह 9:10 से 10:46 बजे तक
  • ब्रह्म मुहूर्त : सुबह 4:28 से 5:13 बजे तक
  • अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:56 से दोपहर 12:47 बजे तक 

वरूथिनी एकादशी पर क्या दान करें?

  • तुलसी का पौधा दान करने से धन लाभ और आर्थिक समस्याओं से राहत मिलती है.
  • सोलह श्रृंगार की वस्तुएं दान करने से वैवाहिक जीवन में सुख और प्रेम बढ़ता है.
  • हल्दी का दान करने से ग्रह दोष कम होते हैं.
  • अन्न का दान करने से जीवन में कभी अन्न की कमी नहीं होती.

किन राशियों को मिलेगा फायदा?

  • कर्क (Cancer): ग्रहों की खास स्थितियों के कारण नवपंचम राजयोग का निर्माण हो रहा है. जिसके कारण इस राशि को जातकों को काफी फायदा हो सकता है. 
  • मेष (Aries): 14 अप्रैल को जैसे ही सूर्य मेष (उच्च राशि) में जाएगा, इस राशि के जातकों को सफलता और खुशहाली मिलने की उम्मीद जताई गई है.
  • इसके अलावा वृषभ, सिंह और धनु राशि वालों को आध्यात्मिक और भौतिक रूप से फायदा मिल सकता है. 

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वरूथिनी एकादशी का महत्व

वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से पापों से मुक्ति मिलती है. साथ ही जीवन में सुख और समृद्धि भी आती है. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस व्रत से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. जिससे आत्मा, मन और शरीर की शुद्धि होती है. साथ ही आने वाले जन्मों में भी इसका फल प्राप्त होता है. कथाओं के मुताबिक, राजा मान्धाता और धुंधुमार ने इस व्रत के प्रभाव से मोक्ष की प्राप्ति की थी.

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