यहां जानवर मनाते हैं दिवाली! बकरी से लेकर गाय तक को बनाया जाता है दुल्हन; सड़कों पर निकाली जाती है ‘बरात’

MP Unique Festival: मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में दिवाली के अगले दिन जानवरों की छुट्टी होती है. इस दौरान उनसे काम नहीं करवाया जाता या खेत नहीं जोते जाते. बल्कि उन्हें दुल्हन दूल्हे की तरह सजाया जाता है.

Published by Heena Khan

MP Diwali Celebration: वैसे तो दिवाली का त्यौहार कई दिन मनाया जाता है. लेकिन एक जगह ऐसी है जहां दिवाली के बाद भी दिवाली जैसा माहौल रहता है. दरअसल, मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में दिवाली के अगले दिन जानवरों की छुट्टी होती है. इस दौरान उनसे काम नहीं करवाया जाता या खेत नहीं जोते जाते. बल्कि उन्हें दुल्हन दूल्हे की तरह सजाया जाता है, इस दौरान उन्हें स्वादिष्ट व्यंजन खिलाए जाते हैं और गांव की सैर भी कराई जाती है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह परंपरा दिवाली के अगले दिन, गोवर्धन पूजा के दौरान, पड़वा पर मनाई जाती है. इतना ही नहीं इस साल अमावस्या दो दिन पड़ने के कारण पड़वा 22 अक्टूबर को मनाई जाएगी. 

जानिए क्या है इसकी मान्यता

ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण गायों और मवेशियों से बहुत प्रेम करते थे, इसलिए इस दिन लोग अपने पशुओं को विशेष श्रृंगार से सजाकर अपना प्रेम और सम्मान पेश करते हैं. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हर गाँव में पशुओं की पूजा की जाती है और उन्हें आशीर्वाद स्वरूप मिठाई और चारा खिलाया जाता है. उनके सींगों को चमकीले रंगों से सजाया जाता है.

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जानवरों का करते हैं शृंगार

आपकी जानकारी के लिए बताए दें कि खरगोन जिले के ग्रामीण इलाकों में इस दिन हर घर में एक अलग ही रौनक होती है. इतना ही नहीं इस दौरान खेतों में काम करने वाले बैलों, गायों और बकरियों को भी नहलाया जाता है और उनके शरीर पर रंग-बिरंगे डिज़ाइन बनाए जाते हैं. उनके सींगों को चटख रंगों से सजाया जाता है. बच्चे और महिलाएं भी इस त्यौहार को लेकर खासे उत्साहित रहते हैं.

इन चीजों से सजाते हैं पशुओं को

दरअसल, यहां बाजारों में जानवरों की सजावट की तैयारियाँ काफी पहले से शुरू हो जाती हैं. दिवाली का सामान मिलने के साथ साथ बाजारों में इनके सजावट का सामान भी मिलने लगता है, दुकानों पर “पशु आभूषण” नामक विशेष सजावटी चीजें बिकती हैं. दुकानदारों का कहना है कि तीन मुख्य आभूषण सबसे ज़्यादा खरीदे जाते हैं: “मछवंडी”, जो रंग-बिरंगे धागों से बुनी जाती है और सिर पर बांधी जाती है. दूसरा “कंडा घुंघरू”, जिसे गले में हार की तरह पहना जाता है. तीसरामोरकीहै, जिसे जालीदार डिज़ाइन में जानवर के मुँह पर बाँधा जाता है.

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