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आप सच्चाई से पूरी तरह दूर…सुप्रीम कोर्ट ने बॉलीवुड की दिग्गज अदाकारा को लगाई फटकार, जानें क्या है पूरा मामला?

Supreme Court On Stray Dogs: अदालत ने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य कुत्तों के प्रति नकारात्मक रवैया अपनाना नहीं है, बल्कि व्यावहारिक और वैज्ञानिक समाधान सुनिश्चित करना है.

Published by Shubahm Srivastava

Supreme Court On Sharmila Tagore Plea: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान अभिनेत्री शर्मिला टैगोर द्वारा पेश की गई दलीलों को कड़ी भाषा में खारिज करते हुए कहा कि उनकी दलीलें “पूरी तरह सच्चाई से परे” हैं. अदालत ने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य कुत्तों के प्रति नकारात्मक रवैया अपनाना नहीं है, बल्कि व्यावहारिक और वैज्ञानिक समाधान सुनिश्चित करना है.

अभिनेत्री की तरफ से दी गई दलीलें और कोर्ट की प्रतिक्रिया

टैगोर की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि सभी कुत्तों को हिंसक या खतरनाक नहीं माना जा सकता और केवल उन्हीं जानवरों को हटाया जाना चाहिए जिन्हें विशेषज्ञ समिति “आक्रामक” घोषित करें. उन्होंने सुझाव दिया कि एक ऐसी समिति गठित की जाए जो कुत्तों के व्यवहार का मूल्यांकन करे और सामान्य तथा खतरनाक कुत्तों के बीच अंतर करें. वकील ने उदाहरण देते हुए बताया कि AIIMS परिसर में रहते हुए ‘गोल्डी’ नामक कुत्ता वर्षों से किसी को नुकसान नहीं पहुंचा रहा.

‘आप सच्चाई से पूरी तरह दूर हैं’

सुप्रीम कोर्ट ने इस उदाहरण को तुरंत खारिज करते हुए कहा कि अस्पतालों में आवारा कुत्तों की मौजूदगी को सामान्य या सुरक्षित मानना गलत है. अदालत ने टिप्पणी की, “आप सच्चाई से पूरी तरह दूर हैं. अस्पतालों में ऐसे कुत्तों का महिमामंडन न करें.” कोर्ट ने यह भी कहा कि सड़क पर रहने वाले कुत्तों में टिक और संक्रमण होना सामान्य है, और अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थानों में यह बेहद खतरनाक हो सकता है. अदालत ने पूछा कि क्या ऐसा कुत्ता ऑपरेशन थिएटर में भी घूमता है, जो उनकी दलील की अव्यावहारिकता को उजागर करता है.

अन्य तर्कों पर अदालत की टिप्पणी

टैगोर की ओर से कुत्तों को पहचान देने के लिए रंगीन कॉलर का विदेशी मॉडल अपनाने का सुझाव दिया गया, जिसका उपयोग जॉर्जिया और आर्मेनिया जैसे देशों में होता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन देशों की आबादी और भौगोलिक परिस्थितियाँ भारत से पूरी तरह अलग हैं और भारतीय संदर्भ में ऐसे उपाय व्यवहारिक नहीं हो सकते.

वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं के मामले में आए फैसले में क्या हुआ था, इस ओर इशारा किया, जो “एक समिति में विशेषज्ञों के बिना” आया था. “न्यायिक दखल सिर्फ़ उन जगहों पर होना चाहिए जहाँ कमियाँ हैं, न कि उन जगहों पर जहाँ विधायिका ने जानबूझकर कानून नहीं बनाया है. अगर आपके लॉर्डशिप उस क्षेत्र में जाते हैं, तो वे एक नई इमारत बना रहे होंगे. सिंहवी ने मामले में एक जटिल तकनीकी बात को समझाते हुए कहा, हालाँकि हमारे एमिकस बहुत अच्छे हैं, लेकिन एमिकस का कॉन्सेप्ट मूल रूप से कानून सलाहकारों का है. वे डोमेन एक्सपर्ट नहीं हैं. आपके लॉर्डशिप के पास एमिकस के साथ डोमेन एक्सपर्ट भी होने चाहिए”.

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नागरिक संघर्ष और हिंसा को लेकर चिंता

सीनियर वकील महालक्ष्मी पावनी ने मुद्दा उठाया कि देश के कई स्थानों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वाले लोगों, विशेषकर महिलाओं, को सतर्कता समूहों और सोसाइटियों द्वारा धमकाया और हमला किया जा रहा है. उन्होंने हरियाणा की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि बाउंसर तक तैनात किए जा रहे हैं और कई महिला feeders पर हाथ उठाया गया है. इस पर कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों को आवारा कुत्तों के प्रबंधन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. यदि महिलाओं पर हमला हो रहा है, तो स्थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज कराई जानी चाहिए और अदालतों का रुख करना चाहिए.

सरकार पर आर्थिक बोझ

अदालत को यह भी बताया गया कि देशभर में सार्वजनिक स्थानों से कुत्तों को हटाने और प्रबंधन में सरकार को लगभग 26,800 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं, इसलिए केवल कानूनी आदेश से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि रणनीतिक, वैज्ञानिक और चरणबद्ध उपाय जरूरी होंगे.

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Shubahm Srivastava

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