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Unique Hanging Story: ‘मौत’ के 2 घंटे बाद कैसे जिंदा रहा ‘यह शख्स’, 1978 में कहां हुआ था ऐसा, हैरान कर देने वाला मामला

By: JP Yadav | Last Updated: January 31, 2026 12:36:13 PM IST



Ranga Billa Unique Hanging Story: राजेश खन्ना और मुमताज अभिनीत फिल्म ‘रोटी’ (1974) का वह सीन याद है जब मंगल (राजेश खन्ना) को फांसी दी जानी होती है. फांसी का फंदा गले में डलने वाला ही होता है कि चंद सेकेंड पहले बदमाशों का गिरोह साजिश के तहत मंगल को जेल से भगा ले जाता है या कहें भाग जाता है. यह सीन हिंदी फिल्मों के प्रेमियों को खूब पसंद आता है. यह तो हुई फिल्म की बात, लेकिन हकीकत में भी ऐसा हो चुका है जब दिल्ली की तिहाड़ जेल में एक शख्स फांसी लगने के बाद 2 घंटे बाद तक जिंदा रहा. जहां ‘रोटी’ फिल्म के क्लाइमेक्स में मंगल पुलिस के हाथों मारा जाता है तो दिल्ली की तिहाड़ जेल में हत्या के दोषी शख्स को पैरों से खींचकर उसकी जान ली जाती है. भारत में फांसी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब कोई फांसी लगने के बाद 2 घंटे तक जिंदा रहा. क्या है पूरा मामला? आखिर क्यों ऐसा हुआ और पता चलने पर तिहाड़ जेल प्रशासन ने क्या किया? यहां पढ़िये पूरे घटनाक्रम की Inside Story.

भारत में ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामलों में ही फांसी की सजा दी जाती है. जज फांसी की सजा सुनाए जाने के दौरान वजह भी बताते हैं. वर्ष 1978 के दिल्ली में हुए बहुचर्चित गीता और संजय चोपड़ा अपहरण-हत्या मामले में दोषी करार दिए गए कुलजीत सिंह (रंगा कुश) और जसबीर सिंह (बिल्ला) को फांसी की सजा सुनाई गई. ‘रंगा-बिल्ला’ ये दोनों नाम आज भी खौफ के प्रतीक हैं. कोई भी शरीफ मां-बाप अपने बच्चों के नाम रंगा या बिल्ला नहीं रखते हैं. यहां पर यह भी बता दें कि इन दोनों कुख्यात अपराधियों के असली नाम रंगा-बिल्ला नहीं था. इन दोनों को सुप्रीम कोर्ट ने गीता और संजय चोपड़ा का अपहरण करने के बाद हत्या और दुष्कर्म के अपराधों के लिए फांसी की सजा सुनाई थी. इसके बाद 1982 में तिहाड़ जेल में फांसी दी गई. यह भारतीय आपराधिक इतिहास में दुर्लभ मामला था. दोनों को फांसी 31 जनवरी, 1982 को दोनों को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई. 

फांसी पर लटकाने के 2 घंटे बाद भी ज़िंदा था एक कुख्यात हत्यारा

यह दुर्लभ मामला था, क्योंकि रंगा और बिल्ला ने किशोर भाई-बहनों की हत्या की थी. हत्या से पहले बहन के साथ दुष्कर्म भी किया था. ऐसे में निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक फांसी के फैसले पर मुहर लगी. फांसी पर अंतिम मुहर लगने के बाद तिहाड़ जेल प्रशासन अलर्ट मोड पर आ गया. वह कोई चूक नहीं करना चाहता था, इसलिए डमी बनाकर कई बार फांसी की रिहर्सल भी की गई. रंगा और बिल्ला को फांसी के लिए मेरठ (उत्तर प्रदेश) और फरीदकोट (पंजाब) से 2 जल्लाद फकीरा और कालू को बुलाया गया था. तिहाड़ जेल में ‘फांसी कोठी’ में एक साथ दोनों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया. कालू और फकीरा ने एक साथ रंगा-बिला के गले में लगाया गया फांसी का फंदा खींचा. फिर लंबी खामोशी छा गई.  इसके बाद जो हुआ वह इतिहास बन गया, क्योंकि फांसी के 2 घंटे बाद जब नियम के मुताबिक, डॉक्टरों ने जांच की तो बिल्ला की जान जा चुकी थी, लेकिन रंगा की नब्ज चल रही थी. डॉक्टर भी यह देखकर चौंक गए. तिहाड़ जेल के अधिकारी सकते में आ गए. ‘ऐसा कैसे हो गया?’ कर्मचारी से लेकर जेलर तक की जुबान पर यही वाक्य था. 

पैरों को खींच मारा गया था रंगा को

आननफानन में सारे अफसर जुटे और एक तरकीब निकाली गई. दिल्ली के तिहाड़ जेल के पूर्व कानून अधिकारी सुनील गुप्ता और पत्रकार सुनेत्रा चौधरी द्वारा लिखी गई किताब ‘ब्लैक वॉरंट’ में इस फांसी के बारे में बारीकी से जिक्र किया गया है. दरअसल, शुरुआत में तिहाड़ जेल के अधिकारी और कर्मचारी समझ ही नहीं पाए कि आखिर रंगा जिंदा कैसे है? जब यह बात  जल्लाद फकीरा और कालू को पता चली तो उनके पैरों तले जमीन निकल गए. इससे पहले दोनों फांसी की रिहर्सल में भी शामिल थे. दिल्ली में जनवरी में पड़ रही ठंड  में तिहाड़ जेल के अफसर पसीने-पसीने हो गए. तत्काल किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था. इस बीच अफसरों ने एक पुलिस वाले को फांसी कोठी के नीचे भेजा. जहां रंगा और बिल्ला फांसी के फंदे पर लटक रहे थे. इसके बाद इसी पुलिस वाले ने रंगा के पैर पकड़ कर उसे ज़ोर से नीचे खींचा. पुलिस वाला तब तक रंगा के पैर पकड़े रहा जब तक कि उसे मरने की तसल्ली नहीं हो गई. 

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क्या था पूरा मामला?

अगस्त, 1978 में देश की राजधानी भाई-बहन की हत्या से हिल गई. धौला कुआं इलाके में रहने वाले नेवी अफसर मदन मोहन चोपड़ा की बेटी गीता और बेटा संजय  घर से ऑल इंडिया रेडियो (AIR) में कार्यक्रम देने के लिए निकले, लेकिन वह ना AIR के ऑफिस पहुंचे और ना ही वापस घर. मदन मोहन चोपड़ा की बेटी गीता चोपड़ा दिल्ली यूनिवर्सिटी के जीजस एंड मैरी कॉलेज में सेकेंड ईयर की छात्रा थी. वह छोटे भाई संजय चोपड़ा के साथ 26 अगस्त, 1978 की शाम को 8 बजे AIR के एक प्रोग्राम में हिस्सा लेने जा रहे थे. बारिश के चलते दोनों ने डॉ. एमएस नंदा से लिफ्ट ली, जिन्होंने दोनों को गोले डाकखाना के पास उतारा. गोल डाकखाना और AIR के बीच की दूरी 1 किलोमीटर के आसपास है. इस बीच दोनों के पास एक फिएट कार आकर रुकी और दोनों का अपहरण कर लिया गया. दुकान मालिक ने शक होने पर पुलिस को अपहरण की सूचना दी. इसकी रिपोर्ट भी राजिंदर नगर थाने में दर्ज की गई थी. गीता और  उसके भाई संजय का शव 28 अगस्त, 1978 को पशु चराने वाले ने रिज के घने जंगल में मिला. जांच में पता चला कि हत्या से पहले गीता के साथ दुष्कर्म किया गया था. पहचान छिपाने और डर के चलते कुलजीत उर्फ ​​रंगा और जसबीर सिंह उर्फ ​​बंगाली उर्फ ​​बिल्ला दोनों को मार डाला. रंगा और बिल्ला बेहद खूंखार अपराधी थे। उन्होंने काफी लूट, हत्याएं, समेत तमाम आपराधिक घटनाएं अंजाम दी थीं.  मशक्कत के बाद दोनों को पकड़ा गया. मुकदमा चला और दिल्ली हाई कोर्ट ने दोनों को फांसी की सज़ा सुनाई, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा. इसके बाद 31 जनवरी 1982 को दोनों को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई.

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