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खाना नहीं जहर खा रहा देश! अंडे-दूध से लेकर मसालों तक में मिलावट, जानिए किचन में रखा भोजन कितना खतरनाक

Food Safety Crisis: वैसे तो हर कोई खाना खाता है लेकिन सवाल ये उठ रहा है कि क्या जो हम खाना खा रहे हैं वो सुरक्षित है या नहीं? भारत में खाना केवल पेट भरने के लिए नहीं खाया जाता, बल्कि संस्कृति, परंपरा और स्वास्थ्य का आधार भी है.

Published by Heena Khan

Food Safety Crisis: वैसे तो हर कोई खाना खाता है लेकिन सवाल ये उठ रहा है कि क्या जो हम खाना खा रहे हैं वो सुरक्षित है या नहीं? भारत में खाना केवल पेट भरने के लिए नहीं खाया जाता, बल्कि संस्कृति, परंपरा और स्वास्थ्य का आधार भी है. लेकिन आज हम जो खाना खा रहे हैं क्या वो सुरक्षित है या नहीं ? अब सवाल पैदा होता है कि क्या हमारी थाली हमें पोषण दे रही है या धीरे-धीरे बीमार कर रही है? मसालों में रंग, दूध में केमिकल, पनीर-खोया में सिंथेटिक पदार्थ, ब्रेड में प्रिज़र्वेटिव और यहाँ तक कि अंडों में भी मिलावट की खबरें आम हो चुकी हैं. यह केवल धोखाधड़ी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट है.

मिलावट का कड़वा सच

हर कोई जानता है कि खाद्य मिलावट कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन इसका पैमाना और असर पहले से कहीं अधिक खतरनाक हो गया है. जहां लाल मिर्च में सूडान डाई, हल्दी में लेड क्रोमेट, धनिया में कृत्रिम रंग मिलाया जाता है वहीं दूध में यूरिया व डिटर्जेंट, पनीर-खोया में सिंथेटिक दूध मिलाया जाता है.ये सब उदाहरण बताते हैं कि मुनाफ़े की होड़ में ज़हर परोसा जा रहा है. कई बार यह मिलावट स्वाद या रंग से पकड़ में नहीं आती, लेकिन शरीर पर इसका असर लंबे समय में दिखता है.

कैसे पक रहा प्लेट में कैंसर

लगातार केमिकल्स, हेवी मेटल्स और सिंथेटिक एडिटिव्स का सेवन शरीर में धीरे-धीरे जमा होता है. लेड, आर्सेनिक और कैडमियम जैसे तत्व किडनी, लिवर और नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुँचाते हैं. कुछ रंग और प्रिज़र्वेटिव कैंसर-कारक (कार्सिनोजेनिक) माने जाते हैं. समस्या यह है कि इनका प्रभाव तुरंत नहीं दिखताबीमारी वर्षों बाद सामने आती है, तब तक कारण का पता लगाना मुश्किल हो जाता है.

दूध, ब्रेड और अंडे सबसे खतरनाक

वैसे तो दूध को “संपूर्ण आहार” कहा जाता है, लेकिन इसमें मिलावट सबसे ज़्यादा पाई जाती है. पानी, यूरिया, स्टार्च और सिंथेटिक दूध बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए बेहद खतरनाक हैं. जो हड्डियों को कमजोर बना रहा है. ब्रेड में ज़्यादा प्रिज़र्वेटिव और ब्लीचिंग एजेंट्स, अंडों में एंटीबायोटिक रेज़िड्यू और हार्मोनये सब आधुनिक खाद्य श्रृंखला की कमजोरियों को उजागर करते हैं. फास्ट लाइफस्टाइल और पैकेज्ड फूड पर निर्भरता ने जोखिम और बढ़ा दिया है.

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क्या कहता है खाद्य सुरक्षा कानून

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत में Food Safety and Standards Act, 2006 लागू है, जिसका उद्देश्य सुरक्षित, स्वच्छ और पौष्टिक भोजन सुनिश्चित करना है. इस कानून के मुताबिक मिलावट, गलत लेबलिंग और असुरक्षित भोजन पर सख़्त दंड का प्रावधान है! इसमें भारी जुर्माना, लाइसेंस रद्द होना और गंभीर मामलों में जेल तक कानून मौजूद है.

FSSAI के हाल

जानकारी के मुताबिक FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) देश की शीर्ष खाद्य नियामक संस्था है. यह मानक तय करती है, निरीक्षण कराती है और जागरूकता अभियान चलाती है. पर वास्तविकता यह है कि निरीक्षकों की कमी, प्रयोगशालाओं की सीमित क्षमता, और राज्यों में अलग-अलग स्तर पर क्रियान्वयन के कारण निगरानी कमजोर पड़ जाती है. कई बार कार्रवाई त्योहारों या मीडिया दबाव के समय ही तेज़ होती है, जबकि नियमित और सख़्त निगरानी की ज़रूरत है.

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खाने को सुरक्षित करना किसी जिम्मेदारी

इस संकट के लिए केवल सरकार या FSSAI को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं. असल में बताया जाए तो निर्माता और विक्रेता मुनाफ़े के लिए मिलावट करने वाले सबसे बड़े अपराधी हैं. वहीं कड़े कानूनों का निरंतर और निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है. वहीं लोगों का सस्ता और चमकदार देखकर बिना सवाल किए खरीदना भी समस्या को बढ़ाता है.

ऐसे होगा समाधान

वैसे तो समाधान बहु-स्तरीय होना चाहिएनियमित निरीक्षण, आधुनिक टेस्टिंग लैब्स, डिजिटल ट्रैकिंग, और कड़े दंड. उपभोक्ताओं को स्थानीय, ताज़ा और भरोसेमंद स्रोतों से खरीदारी करनी चाहिए, लेबल पढ़ने की आदत डालनी चाहिए और संदिग्ध उत्पादों की शिकायत करनी चाहिए. स्कूलों और समुदायों में खाद्य सुरक्षा शिक्षा ज़रूरी है.

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