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‘हीरो को तो नंगा दिखा नहीं सकते…’, स्मिता पाटिल का ये सवाल, जिसने इंडस्ट्री को सोचने पर किया मजबूर

Smita Patil Story: फिल्मों में महिलोओं के शोषण और उन्हें वस्तु समझने के बारे में चर्चा शुरू होने से पहले ही स्मिता पाटिल इस सिस्टम को चुनौती दे रही थी. एक ऐसे दौर में जब ग्लैमर और सेक्शुअलाइज़्ड इमेज को फिल्में बेचने का सबसे आसान तरीका माना जाता था.

By: Mohammad Nematullah | Published: January 6, 2026 7:27:14 PM IST



Smita Patil Story: फिल्मों में महिलोओं के शोषण और उन्हें वस्तु समझने के बारे में चर्चा शुरू होने से पहले ही स्मिता पाटिल इस सिस्टम को चुनौती दे रही थी. एक ऐसे दौर में जब ग्लैमर और सेक्शुअलाइज़्ड इमेज को फिल्में बेचने का सबसे आसान तरीका माना जाता था. स्मिता ने साफ तौर पर कहा कि महिलाओं को सिर्फ मार्केटिंग टूल के तौर पर इस्तेमाल करना गलत है. 

स्मिता पाटिल को कभी भी सिर्फ सजावटी रोल करने में दिलचस्पी नहीं थी. उन्होंने ऐसी फिल्में चुनीं जो असल ज़िंदगी संघर्षों और भावनाओं को दिखाती थी. उनकी पॉपुलर फिल्में जैसे भूमिका, मंथन, आक्रोश, अर्ध सत्य और मिर्च मसाला में महिलाओं को सशक्त, स्वतंत्र और मजबूत दिखाया गया है. सिर्फ सुंदरता की वस्तु के तौर पर पर्दे के बाहर भी स्मिता उतनी ही निडर थीं.

दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाना

एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने खुले तौर पर कहा था कि यह मानना ​​गलत है कि फिल्में तभी हिट होंगी जब उनमें कम कपड़े पहनी हुई महिला किरदार होंगी. उन्होंने कहा ‘आप हीरो को नंगा नहीं दिखा सकते है. उससे कुछ नहीं होगा. लेकिन अगर आप किसी महिला को नंगा दिखाते हैं, तो ऐसा लगता है कि सौ और लोग देखने आएंगे. यह सोच भारतीय दर्शकों पर थोपी गई है. ‘देखो इसमें सेक्स है, इसमें आधे-अधूरे कपड़े पहने शरीर हैं, तो आओ और फिल्म देखो.’ यह एक ऐसी सोच बन गई है जो बहुत गलत है. अगर कोई फिल्म सफल होगी, तो वह इसलिए होगी क्योंकि वह दिल से कहानी कहती है. फिल्में सिर्फ ऐसे पोस्टरों की वजह से नहीं चलतीं है.’

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स्मिता ने न सिर्फ फिल्म निर्माताओं को बल्कि उस सामाजिक सोच को भी चुनौती दी जो मानती थी कि लोग सिर्फ महिलाओं की सेक्शुअलाइज़्ड इमेज से ही फिल्मों की तरफ आकर्षित होंगे. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पुरुषों के साथ ऐसा कभी नहीं होता है. यह एक दोहरा मापदंड है.

पैरेलल सिनेमा में एक मजबूत मौजूदगी

स्मिता पाटिल की असली ताकत यह थी कि वह जो कहती थीं, वही करती थी. उनकी फिल्मों की पसंद ने उन्हें भारतीय पैरेलल सिनेमा में एक महत्वपूर्ण हस्ती बना दिया है. उनकी फिल्मों में सामाजिक दबावों, अन्याय और सत्ता संघर्षों से जूझ रही महिलाओं की कहानियों को दिखाया गया है. उनके काम ने आने वाली पीढ़ियों की अभिनेत्रियों और फिल्म निर्माताओं को महिलाओं की भूमिकाओं के बारे में नए तरीकों से सोचने के लिए प्रेरित किया है.

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असामयिक मृत्यु और पीछे छूटा खालीपन

दुर्भाग्य से स्मिता की ज़िंदगी बहुत जल्दी खत्म हो गई है. 13 दिसंबर 1986 को बच्चे के जन्म के बाद की जटिलताओं के कारण 31 साल की कम उम्र में उनका निधन हो गया है. उनकी मृत्यु से फिल्म इंडस्ट्री हिल गई, और उनके जाने से जो खालीपन आया है, वह आज भी महसूस होता है. फिर भी उनका साहस, उनकी आवाज और सिनेमा में उनके योगदान से आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिलती रहेगी.

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