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इराक से ईरान तक, अमेरिका ने फिर दोहराया 2003 वाला इतिहास! समझें क्या है ट्रंप का मीडिल ईस्ट को लेकर प्लान?

Iraq War 2003: ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि अमेरिका और इज़राइल को शक है कि तेहरान परमाणु हथियार विकसित करना चाहता है.

Published by Shubahm Srivastava

US-Israel Iran Tensions: अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद मीडिल ईस्ट के आसमान में मिसाइलें और ड्रोन्स दिखाई दे रहे हैं. वहीं सबसे बड़ी खबर जो सामने आ रही है वो  ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की है? यह अभी दुनिया का सबसे बड़ा सवाल बन चुका है.  न्यूज एजेंसी रॉयटर्स को एक वरिष्ठ इजराइली अधिकारी  जानकारी देते हुए बताया है कि ‘ईरान के सुप्रीम लीडर, अयातुल्ला सैय्यद अली खामेनेई की मौत हो गई है, उनका शव मिल गया है. ट्रंप से लेकर नेतन्याहू तक इस बात की पुष्टि कर चुके हैं.

ईरान दोहराएगा इराक का इतिहास

2003 में अमेरिका ने तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के नेतृत्व में इराक पर हमला किया. दावा किया गया कि इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के पास “विनाशकारी हथियार” (WMD – Weapons of Mass Destruction) हैं, जो वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा हैं. अमेरिकी प्रशासन ने कहा कि इराक के पास रासायनिक, जैविक और संभवतः परमाणु हथियार कार्यक्रम सक्रिय है. यही तर्क युद्ध का मुख्य आधार बना.

हालांकि, इराक पर कब्ज़े के बाद जब अंतरराष्ट्रीय जांच हुई, तो किसी भी सक्रिय WMD भंडार का सबूत नहीं मिला. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्टें या तो गलत थीं या उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था. बाद में यह स्वीकार किया गया कि युद्ध से पहले दी गई जानकारी खुफिया विफलता थी. इस घटना ने अमेरिकी विदेश नीति और खुफिया विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए.

ईरान संकट से समानताएं

आज ईरान को लेकर पश्चिमी देशों और इज़राइल की चिंताएं मुख्य रूप से उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर हैं. ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि अमेरिका और इज़राइल को शक है कि तेहरान परमाणु हथियार विकसित करना चाहता है. यह स्थिति कई विश्लेषकों को 2003 से पहले के इराक जैसी लगती है — जहां संभावित खतरे को तत्काल और वास्तविक खतरे के रूप में पेश किया गया था.

हालांकि एक बड़ा अंतर यह है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) करती रही है, और 2015 में ईरान और विश्व शक्तियों के बीच परमाणु समझौता (JCPOA) भी हुआ था. बाद में अमेरिका ने डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में इस समझौते से बाहर निकलने का फैसला किया.

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ट्रंप और इज़राइल का समर्थन

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति रहते हुए इज़राइल की सुरक्षा को प्राथमिकता दी. भले ही कुछ समय पर ईरान के साथ सकारात्मक परमाणु वार्ताओं की चर्चा रही हो, ट्रंप प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया — प्रतिबंध लगाए और इज़राइल के “सुरक्षा कदमों” का समर्थन किया. इज़राइल का मानना है कि ईरान क्षेत्रीय अस्थिरता फैला रहा है, विशेषकर हिज़्बुल्लाह और अन्य समूहों के समर्थन के जरिए.

ट्रंप का समर्थन केवल परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं था. यह मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन, तेल मार्गों की सुरक्षा, और अमेरिका-इज़राइल रणनीतिक गठबंधन को मजबूत रखने से भी जुड़ा था.

क्या मुद्दा सिर्फ हथियारों का है?

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल हथियारों का सवाल नहीं, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक शक्ति संघर्ष है. मध्य पूर्व में प्रभाव, ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण, और क्षेत्रीय प्रभुत्व — ये सभी कारक भूमिका निभाते हैं.

इराक युद्ध ने दिखाया कि अधूरी या गलत जानकारी पर आधारित सैन्य कार्रवाई के दीर्घकालिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं. ईरान संकट के संदर्भ में भी यही सवाल उठता है – क्या भू-राजनीतिक रणनीति एक बार फिर टकराव की राह खोलेगी.

Shubahm Srivastava

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