Iran Conflict: जब भी ईरान का सामना अमेरिका या इसराइल से होता है, वो अपनी इस्लामी ताकत दिखाने लगता है. ईरान हमेशा ये दिखाने की कोशिश करता है कि वो सिर्फ़ एक देश नहीं, बल्कि पूरे इस्लामी जगत की आवाज़ है. लेकिन सच्चाई यह है कि अब तक यह पहचान इतनी मज़बूत नहीं बन पाई है कि दूसरे इस्लामी देश अपने राष्ट्रीय और आर्थिक हितों को छोड़कर धर्म के नाम पर ईरान के साथ खुलकर खड़े हो जाएं. वहीं 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान इस क्षेत्र का इकलौता ऐसा देश है जो लगातार अमेरिका के दबदबे को चुनौती देता रहा है. इसके उलट, ज़्यादातर इस्लामी देश अमेरिका के खास मेहमान रहे हैं और सहियोगी भी.
नहीं बना पाया दूसरे देशों से मजबूत रिश्ते
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ईरान की नज़दीकी चीन और रूस से मानी जाती है, लेकिन ये दोनों देश अमेरिका से सीधे सैन्य टकराव से बचते हैं. वहीँ तुर्की कभी-कभी ईरान के समर्थन में बयान देता है, लेकिन वो नाटो का सदस्य है और उसके हित कई मौकों पर ईरान से टकराते रहे हैं. सीरिया इसका बड़ा उदाहरण है. वहां लंबे समय तक ईरान समर्थक बशर अल-असद की सरकार रही, लेकिन इसमें तुर्की की भूमिका भी अहम थी. यानी क्षेत्रीय राजनीति में दोस्ती स्थायी नहीं, बल्कि हितों पर आधारित होती है.
बयान ज़्यादा, कार्रवाई कम
जानकारी के मुताबिक पिछले साल जब अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया, तब 21 मुस्लिम देशों ने इसकी निंदा की थी. इनमें सऊदी अरब, तुर्की, पाकिस्तान, यूएई और मिस्र जैसे बड़े नाम शामिल थे. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये बयान ज़्यादातर ‘चेहरा बचाने’ के लिए थे. मध्य पूर्व मामलों के जानकार डॉ. फज्जुर रहमान के अनुसार, मुस्लिम देश अक्सर अपनी छवि बचाने के लिए ऐसे बयान देते हैं, न कि ईरान के साथ खड़े होने के इरादे से. कई ऐसे देश थे जिनके इसराइल के साथ अच्छे राजनयिक संबंध हैं, इसलिए उनका समर्थन सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित रहा.