Shab-e-Baraat History: जैसा की आप सभी जानते हैं कि 4 फरवरी 2026 को शब-ए-बारात की रात है. ये रात मुसलमानों के लिए सबसे अहम रात मानी जाती है. इस्लाम में शब-ए-बारात का एक खास महत्व है. इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक, शब-ए-बारात आठवें महीने शाबान की 15वीं रात को मनाई जाती है, वहीं इस रात के बारे में ऐसा कहा जाता है कि शब-ए-बारात की रात जीवन और मृत्यु का भाग्य तय होता है. इसलिए, शब-ए-बारात को इबादत, बरकत, रहमत और माफी की रात कहा जाता है. इस रात अल्लाह अपने बंदों को अपनी पिछली गलतियों को सुधारने और नेकी के रास्ते पर चलने का नया मौका देते हैं.
शब-ए-बारात का अर्थ
मुसलमान शब-ए-बारात की पूरी रात इबादत करते हैं और अगले दिन शाबान का रोज़ा रखते हैं. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शब-ए-बारात एक अरबी शब्द है जो दो हिस्सों से बना है: “शब,” जिसका मतलब रात है, और “बारात,” जिसका मतलब माफ़ी है. इसलिए, इसे माफ़ी की रात कहा जा सकता है. लोग पूरी रात दुआ करते हैं, यह मानते हुए कि अल्लाह इस रात अपने बंदों की सभी दुआएं कुबूल करता है. इसलिए, हर कोई इस रात अपने गुनाहों की माफ़ी मांगता है.
क्यों मनाते हैं मुसलमान शब-ए-बारात?
इस्लामिक विद्वान और दिल्ली की फतेहपुरी मस्जिद के इमाम, मुफ्ती मुकर्रम का कहना है कि लोग इसे आम तौर पर शब-ए-बारात कहते हैं, लेकिन सही शब्द शब-ए-बरात है. पहला शब्द, ‘शब,’ का मतलब रात होता है, और दूसरा शब्द, ‘बरात,’ दो हिस्सों से बना है: ‘बरा,’ जिसका मतलब माफ किया जाना या आज़ाद होना, और ‘अत,’ जिसका मतलब दिया जाना. इसलिए, यह माफ किए जाने या जहन्नम से आज़ाद होने की रात है. यही वजह है कि शब-ए-बारात को इबादत, बरकत, रहमत और माफी की रात माना जाता है.
क्यों कहा जाता है इबादत की रात
इस्लाम में, कई ऐसी रातें हैं जिनका बाकी सभी रातों से ज़्यादा महत्व है. इनमें लैलतुल-क़द्र की 5 रातें शामिल हैं, जो रमज़ान के आखिरी दस दिनों में आती हैं. ये रमज़ान की 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29वीं रातें हैं. इनके अलावा, इसरा और मेराज की रात और शब-ए-बरात की रात भी है. इन सात रातों का इस्लाम में खास महत्व और फ़ज़ीलत है. इन सभी सात रातों में, मुसलमान पूरी रात नमाज़ और इबादत में बिताते हैं, और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते हैं.

