Premanand Maharaj: प्रेमानंद जी महाराज के दिए हुए संदेश और उनके प्रवचन हर कोई सुनता है, उनके हर एक प्रवचन में एक ऐसी बात होती है जो हर कोई जानना चाहता है. उनके अनुयायी लगातार उनके प्रवचन सुनते हैं और उनसे जुड़ने का प्रयास करते हैं. आपने “सूर्यास्त के समय भोजन नहीं करना चाहिए” कहावत तो सुनी ही होगी, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों कहा जाता है? हमारे ऋषियों ने कुछ खास समयों को न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक कारणों से भी अत्यंत विशेष माना है. इन्हीं में से एक समय है संध्या के 48 मिनट, जिसकी प्रेमानंद महाराज ने बहुत ही खूबसूरती से व्याख्या की है. वहीं एक भक्त ने महाराज जी से पूछा, “महाराज जी, आप कहते हैं कि संध्या के समय भोजन नहीं करना चाहिए, लेकिन ऐसा क्यों है? इस प्रश्न का महाराज जी का उत्तर न केवल अध्यात्म से जुड़ा है, बल्कि हमारे तन और मन के संतुलन से भी जुड़ा है.
क्या कहते हैं महाराज?
इसे लेकर महाराज जी कहते हैं कि संध्या का समय केवल पूजा-पाठ के लिए ही नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि का भी समय होता है. इस दौरान तन, मन और आत्मा को शांत करने का अवसर प्रदान होता है. उन्होंने कहा कि अगर इस समय का सदुपयोग किया जाए, तो जीवन में शांति और सकारात्मकता स्वतः ही बढ़ जाती है. आइए जानें संध्या के इन 48 मिनटों के पीछे का रहस्य और इन्हें सही तरीके से कैसे जीया जाए.
क्या है संध्या का महत्व ?
इस 48 मिनटों को लेकर प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि जैसे ही सूर्य अस्त होने लगता है, पृथ्वी पर ऊर्जा का परिवर्तन होता है. दिन की तीव्र ऊर्जा धीरे-धीरे शांत हो जाती है और रात्रि की स्थिर ऊर्जा प्रवेश करती है. इस समय शरीर का पाचन तंत्र भी हल्का हो जाता है. इसलिए, यदि हम इस समय भोजन करते हैं, तो भोजन ठीक से पच नहीं पाता और आलस्य या बेचैनी बढ़ सकती है. इसीलिए हमारे बड़े-बुजुर्ग हमेशा कहते आए हैं, “सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए, बल्कि भक्ति में लीन रहना चाहिए.