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Hinglaj Shaktipeeth: पाकिस्तान में अनोखा आस्था स्थल, जहां बलूच मुसलमान करते हैं देवी मां के मंदिर की रखवाली

Hinglaj Shaktipeeth: पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित हिंगलाज माता का मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है और गहरी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है. इसे चारधाम यात्रा के समान पुण्यदायी माना जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, यहां सती का अंग गिरा था. यह स्थल हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक भी है, जहां स्थानीय बलोच समुदाय मंदिर की देखभाल करता है.

By: Ranjana Sharma | Published: March 26, 2026 11:51:24 AM IST



Hinglaj Shaktipeeth: पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित हिंगलाज माता का मंदिर आस्था, इतिहास और सांप्रदायिक सौहार्द का अद्भुत संगम है. हिंगोल नदी के तट पर स्थित यह शक्तिपीठ चैत्र नवरात्र के दौरान विशेष रूप से श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बन जाता है.

हिंगलाज शक्तिपीठ 

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, मां आदिशक्ति के 51 शक्तिपीठों में हिंगलाज का विशेष स्थान है. यह मंदिर मां दुर्गा के लज्जा स्वरूप से जुड़ा हुआ है. ‘हिंग’ का अर्थ रौद्र और ‘लाज’ का अर्थ लज्जा माना जाता है, जिससे इस शक्तिपीठ का नाम हिंगलाज पड़ा. धार्मिक मान्यता है कि हिंगलाज भवानी के दर्शन करना चारधाम यात्रा के बराबर पुण्य देता है. जैसे प्रयाग संगम में स्नान और गंगा तर्पण का महत्व है, वैसे ही यहां दर्शन करना भी अत्यंत फलदायी माना जाता है. दुर्गा चालीसा में भी हिंगलाज माता की महिमा का वर्णन मिलता है.

पौराणिक कथा से जुड़ा इतिहास

पौराणिक कथाओं के अनुसार, सती के पिता दक्ष प्रजापति द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने पर सती ने यज्ञ में कूदकर प्राण त्याग दिए. इसके बाद भगवान शिव शोक में उनके शरीर को लेकर भटकने लगे. तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 भाग कर दिए, जो अलग-अलग स्थानों पर गिरकर शक्तिपीठ बने.

यहां गिरा था सती का अंग

मान्यता है कि सती के सिर का पिछला हिस्सा बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के किनारे चंद्रकूट पर्वत पर गिरा था. इसी स्थान पर आज हिंगलाज भवानी का मंदिर स्थित है. ‘हिंगुला’ शब्द का संबंध सिंदूर से है, इसलिए सुहागिन महिलाओं में इस स्थान को लेकर विशेष आस्था है.

हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल

हिंगलाज शक्तिपीठ को स्थानीय लोग “नानी की दरगाह” भी कहते हैं. इस मंदिर की देखभाल बलोच मुस्लिम समुदाय करता है, जो इसे एक पवित्र स्थल मानते हैं. यही कारण है कि यह स्थान धार्मिक सद्भाव की अनोखी मिसाल बन गया है. इतिहासकारों के अनुसार, यह मंदिर लगभग 2000 वर्ष पुराना है. यहां देवी गुफा के भीतर पिंडी रूप में विराजमान हैं. सिंध और कराची सहित दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

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