Home > देश > Kerala Kumbh Mela: क्या है ये केरला महामाघम 2026? क्यों फिर से ये 259 साल पुरानी परंपरा जीवित हो रही, कुंभ से क्यों लोग कर रहे तुलना?

Kerala Kumbh Mela: क्या है ये केरला महामाघम 2026? क्यों फिर से ये 259 साल पुरानी परंपरा जीवित हो रही, कुंभ से क्यों लोग कर रहे तुलना?

Kerala Kumbh Mela: जैसे लोग कुंभ के लिए काफी बेताब होते हैं, वैसे ही केरल का महामाघम काफी समय बाद होने जा रहा है. आइए जानते हैं कि 259 साल पुरानी परंपरा फिर से क्यों जीवित हो रही है.

By: sanskritij jaipuria | Last Updated: January 20, 2026 1:22:04 PM IST



Kerala Kumbh Mela:  सालों बाद महा कुंभ जैसा एक त्योहार केरल में मनाया जा रहा है. तिरुनावाया, मालप्पुरम में नील (भरतापुझा) नदी के किनारे 259 साल पुरानी धार्मिक परंपरा का पुनरुद्धार किया गया है. इसे केरला महामाघम 2026 या माघमक महोत्सव कहा जा रहा है. ये आयोजन 19 जनवरी, 2026 को शुरू हुआ और इसे ‘दक्षिण भारत का पहला कुंभ’ कहा गया है.

ये उत्सव एक ऐतिहासिक परंपरा का पुनरुद्धार है, जो पहले हर 12 साल में मनाई जाती थी. ये परंपरा लगभग 1766 ईस्वी में हयदर अली और टीपू सुल्तान के आक्रमणों के बाद बंद हो गई थी.

 259 साल पुरानी परंपरा क्यों जीवित की जा रही है?

सांस्कृतिक पुनरुद्धार- जुना अखाड़ा और ओरल हिस्ट्री रिसर्च फाउंडेशन जैसे संगठक इस खोई हुई धार्मिक विरासत को वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं. इसे पहले महामंगल्य या महा मखन के नाम से जाना जाता था.

दक्षिण का काशी- तिरुनावाया को ऐतिहासिक रूप से दक्षिण भारत का काशी कहा जाता है. ये जगह बली थर्पणम (पूर्वजों की आत्मा शांति के लिए अनुष्ठान) के लिए फेमस है.

भक्ति और धार्मिक जागरूकता- इस आयोजन को प्राचीन वेदिक-तांत्रिक परंपराओं को पुनर्जीवित करने और मंदिरों को जीवित रखने का माध्यम माना जा रहा है. ये एक तरह से जड़ों की ओर वापसी और पुरानी धार्मिक परंपराओं को फिर से अपनाने का प्रयास है.

केरला के प्राचीन मंदिर इतिहास और वैष्णव परंपरा से संबंध

त्रिमूर्ति संगम- महोत्सव का केंद्र नवमुकुंद मंदिर है, जो तिरुनावाया में स्थित एक बड़ा विष्णु मंदिर है.

प्राचीन परंपरा- ये स्थान ऐतिहासिक रूप से मामन्कम उत्सव के लिए जाना जाता है, जो एक 12-साल का उत्सव था और जमोरिन शासकों द्वारा आयोजित किया जाता था.

आस्था को फिर से जागृत करना- संगठकों का मानना है कि इन अनुष्ठानों को पुनर्जीवित करने से क्षेत्र की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक संरचना मजबूत होती है. ये लोगों को अपनी जड़ों और प्राचीन परंपराओं से जोड़ता है.

कुंभ मेले के तरीके को अपनाना

पवित्र नदी में स्नान- इसमें नील स्नानम (भरतापुझा नदी में पवित्र स्नान) और नील आरती शामिल हैं, जो कुंभ मेले के स्नान अनुष्ठानों से मिलते-जुलते हैं.

संन्यासी संगम- इस आयोजन में संन्यासियों, संतों और धार्मिक नेताओं की भागीदारी होती है, विशेष रूप से जुना अखाड़ा के संन्यासी. इससे आयोजन का कुंभ जैसी भव्यता बनती है.

12-वर्षीय चक्र और ज्योतिष- महमाघम परंपरागत रूप से 12-वर्षीय चक्र से जुड़ा है, जो कुंभ मेले की तरह सांस्कृतिक और धार्मिक चक्रीय परंपरा को दर्शाता है.

दक्षिण की गंगा- भरतापुझा नदी को केरला में उतना ही पवित्र माना जाता है जितना कि गंगा को उत्तर भारत में.

राजनीतिक महत्व (चुनाव से 3 महीने पहले)

हिंदू मतदाता को एकजुट करना- केरला में जहां हिंदू मतदाता लगभग 55% हैं, ऐसे धार्मिक आयोजन हिंदू भावनाओं को मजबूत करने का माध्यम बन सकते हैं.

बीजेपी और धार्मिक पहचान- इस आयोजन को बीजेपी की क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की कोशिश से जोड़ा जा रहा है.

विवाद और रोक- राज्य सरकार ने पर्यावरण कारणों से आयोजन को रोक दिया, जिससे बीजेपी ने इसे धार्मिक रोक करार दिया.

हिंदू कथा- पुरानी परंपरा को फिर से जीवित करने को राजनीतिक दृष्टि से हिंदू गौरव और सांस्कृतिक पुनरुद्धार के रूप में देखा जा रहा है.

Advertisement