Supreme Court On EC: सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मामले की सुनवाई की. सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव परिणामों में तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता, जब तक जीत का अंतर, कथित रूप से सूची से बाहर किए गए वोटरों की संख्या से कम न हो.
यह टिप्पणी चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को स्पष्ट करती है. अदालत ने यह भी संकेत दिया कि हर त्रुटि के आधार पर चुनाव परिणामों को चुनौती देना उचित नहीं है, बल्कि इसका मूल्यांकन तथ्यों और अंतर के आधार पर किया जाना चाहिए.
संवैधानिक संस्थाओं के बीच फंसे मतदाता
जस्टिस जॉयमाल्या बागची और सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने इस दौरान गंभीर चिंता जताई कि पश्चिम बंगाल के मतदाता अलग-अलग संवैधानिक संस्थाओं के बीच “पिस” रहे हैं. अदालत ने कहा कि यह मामला किसी “ब्लेम गेम” का नहीं है, बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों का है. न्यायालय ने साफ किया कि अदालतें चुनावों में बाधा डालने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें सुचारू रूप से संचालित करने के लिए हस्तक्षेप करती हैं. यह टिप्पणी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करती है.
चुनाव आयोग की दलील और कोर्ट के सवाल
सुनवाई के दौरान Election Commission of India ने दलील दी कि न्यायिक अधिकारियों ने तार्किक विसंगति (Logical Discrepancy) के 47% मामलों को खारिज कर दिया है. ये अधिकारी चुनाव आयोग द्वारा जारी नोटिसों पर निर्णय ले रहे थे. इस पर कोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि संदिग्ध मतदाताओं की सूची खुद चुनाव आयोग ने ही तैयार की थी.
जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि यहां “साध्य साधनों को सही ठहराता है” नहीं, बल्कि “साधन ही साध्य को सही ठहराते हैं” का सिद्धांत लागू होना चाहिए. यानी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता परिणाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है.
वोटिंग अधिकार और त्रुटियों की गुंजाइश
अदालत ने यह भी माना कि बड़े पैमाने पर दस्तावेजों की जांच में त्रुटियां होना स्वाभाविक है. कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि रोज 1000 दस्तावेज देखे जाएं और 70% सटीकता हो, तो इसे भी अच्छा माना जाएगा. ऐसे में गलती की संभावना बनी रहती है.
इसलिए एक मजबूत अपील प्रणाली की आवश्यकता है, ताकि जिन मतदाताओं को गलत तरीके से बाहर किया गया है, उन्हें न्याय मिल सके. कोर्ट ने यह भी कहा कि वोट देने का अधिकार केवल संवैधानिक ही नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह नागरिकों को लोकतंत्र में भागीदारी का अवसर देता है.
2002 की वोटर लिस्ट पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने 2002 की वोटर लिस्ट के उपयोग पर भी सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि SIR से जुड़ी मूल अधिसूचना में 2002 की सूची का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन बाद में “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लिस्ट” में इसे आधार बनाया गया. अदालत ने यह भी याद दिलाया कि बिहार SIR मामले में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया था कि 2002 की सूची में शामिल मतदाताओं को अतिरिक्त दस्तावेज देने की जरूरत नहीं है.
इस विरोधाभास पर कोर्ट ने आयोग से स्पष्टीकरण मांगा. यह मुद्दा पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
‘इतिहास रचने के करीब संसद’, नारी शक्ति वंदन सम्मेलन में क्या बोले पीएम मोदी?