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Dismantling a Legacy: विरासत से बदलाव तक, भारतीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी का उदय

भारतीय लोकतंत्र की विरासत, औपनिवेशिक निराशावाद और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आए बदलाव पर विस्तृत विश्लेषण. जानें कैसे 2014 का चुनाव भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़ बना.

Published by Shivani Singh

PM Modi 75th birthday Special: “विरासत” एक ऐसा शब्द है जो अपने आप में अनोखा और गहरा अर्थ समेटे हुए है. इसका इस्तेमाल अक्सर दुनिया भर में राजनीतिक राजवंशों, राजनीतिक दलों, पारिवारिक व्यवसायों और यहाँ तक कि मीडिया संस्थानों पर चर्चा के दौरान किया जाता है. कैम्ब्रिज डिक्शनरी विरासत को “किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उससे प्राप्त धन या संपत्ति” के रूप में परिभाषित करती है. लेकिन विरासत सिर्फ़ धन या संपत्ति तक सीमित नहीं है. यह सामाजिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक धरोहर भी है, जिसे हमें अपने पूर्वजों से प्राप्त होता है.

भारत आज भी औपनिवेशिक राज की उस विरासत से जूझ रहा है, जिसके भौतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक निशान हमारे जीवन का हिस्सा बने हुए हैं. इन तमाम विरासतों में से इस अध्याय का केंद्रबिंदु है राजनीतिक विरासत.

औपनिवेशिक निराशावाद और भारतीय लोकतंत्र

1950 के दशक से ही भारतीय लोकतंत्र पर उसके आलोचकों द्वारा बार-बार सवाल उठाए जाते रहे हैं. कईयों ने इसके पतन और सामाजिक ताने-बाने के बिखरने की भविष्यवाणी की। यह निराशावादी सोच औपनिवेशिक शासन की सबसे बड़ी विरासत थी. अंग्रेज़ों का मानना था कि उनके जाने के बाद भारत टुकड़ों में बंट जाएगा। यही निराशा आज़ादी के बाद भी राजनीतिक और बौद्धिक चर्चाओं में दिखाई देती रही.

सांस्कृतिक पहचान को लेकर जब भी कोई प्रयास हुआ, आलोचकों ने उसे धर्मनिरपेक्ष ढांचे के टूटने का ख़तरा बताया. लेकिन असल चुनौती हमारे धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक पहचान की है जो हमारे सामूहिक अतीत से जुड़ी है.

लोकतंत्र का लचीलापन और मोदी का उदय

भारतीय लोकतंत्र की असली ताक़त उसका लचीलापन है, जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गढ़ा गया और आज भी इसकी सबसे बड़ी पहचान है. नरेंद्र दामोदर दास मोदी, जो आज देश के प्रधानमंत्री हैं, अपने पूर्ववर्तियों से बिलकुल अलग हैं.

नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी या यहाँ तक कि पी.वी. नरसिम्हा राव, ये सभी कहीं न कहीं कांग्रेसी व्यवस्था की उपज थे. इसके विपरीत, मोदी नेहरूवादी सर्वसम्मति या किसी राजनीतिक विरासत के वारिस नहीं हैं. उनमें भारत की सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत गौरव के प्रति गहरी आस्था है.

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2004 से 2014: बदलाव की ज़मीन

2004 से 2014 का दशक भारतीय राजनीति का टर्निंग प्वॉइंट था. परमाणु समझौते से लेकर मुंबई हमले, अन्ना हज़ारे आंदोलन और राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले तक, इस दशक ने भारतीय राजनीति को हिला कर रख दिया.

घोटाले, नीतिगत ठहराव और भ्रष्टाचार ने जनता, ख़ासकर युवा और शहरी मतदाताओं में गहरी निराशा भर दी। यही माहौल नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में उदय का आधार बना.

2004 की हार के बाद भाजपा नेतृत्व संकट से जूझ रही थी. वाजपेयी और आडवाणी उम्रदराज़ हो चुके थे और पार्टी को एक नए चेहरे की तलाश थी. गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी पहले ही अपने विकास मॉडल और जनता से सीधे संवाद की क्षमता के लिए पहचाने जाने लगे थे.

2002 के दंगे, भले ही विवादित रहे हों, लेकिन पार्टी समर्थकों के बीच मोदी की छवि को एक मज़बूत नेता के रूप में स्थापित कर गए.  2013 तक उन्होंने पार्टी के भीतर विरोध को पीछे छोड़ते हुए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में जगह बना ली.

2014 का चुनाव भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़

2014 का चुनाव भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक साबित हुआ. मोदी का चुनावी अभियान पैमाने, रणनीति और तकनीक के इस्तेमाल में बिल्कुल नया था. अच्छे दिन का नारा, विकास और रोज़गार के वादों के साथ हर वर्ग और क्षेत्र के मतदाताओं तक पहुँचा.

सोशल मीडिया, 3डी होलोग्राम और सीधे संवाद पर आधारित उनका प्रचार पारंपरिक राजनीति से बिलकुल अलग था. उन्होंने खुद को दिल्ली की सत्ता से दूर एक साधारण पृष्ठभूमि वाले बाहरी व्यक्ति के रूप में पेश किया, जो आम लोगों की आकांक्षाओं को समझता है.

वैश्विक और घरेलू मान्यता

2014 की जीत को वैश्विक मीडिया ने भारत के लिए एक नई सुबह बताया.

द इकोनॉमिस्ट ने उन्हें दशकों में भारत का सबसे शक्तिशाली नेता कहा.

टाइम मैगज़ीन ने उन्हें अपने कवर पर जगह देते हुए भारत का मुख्य विभाजक बताया.

घरेलू स्तर पर नतीजा साफ़ था, तीस साल बाद किसी एक पार्टी ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया. मोदी ने न केवल भाजपा को पुनर्जीवित किया, बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा और परिभाषा भी बदल दी.

अपने पहले कार्यकाल में ही मोदी ने सुशासन और विकास की दिशा में कई पहल शुरू कीं. उनके नेतृत्व में भारत की राजनीति, समाज और संस्कृति में गहरे बदलाव देखने को मिले। उनका उदय सिर्फ़ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की लचीलापन और जनता की आकांक्षाओं का प्रमाण है.

नोट: डॉ. ऐश्वर्या पंडित शर्मा जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. यह लेख डॉ. ऐश्वर्या पंडित द्वारा लिखित निबंध “Dismantling a Legacy” से लिया गया है, जो पुस्तक Indian Renaissance: The Age of PM Modi में प्रकाशित हुआ है, जिसे स्वयं लेखिका ने संपादित किया है.

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