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Women’s Safety: दिल्ली या मुंबई? महिलाओं के लिए कौन सा शहर है सुरक्षित और कौन सा नहीं; देखें पूरी लिस्ट

Nari 2025 Report: रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली, कोलकाता, रांची, श्रीनगर और फरीदाबाद जैसे शहर महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित माने गए हैं।

Published by Shivani Singh

Unsafe Cities: भारत में नारी को देवी का स्वरूप माना जाता है, लेकिन यही नारी जब सड़कों पर निकलती हैं, तो खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। अपने ही शहर में यह देवी स्वरुप नारी खुद को महफूज नहीं मानती। आज़ादी के 78 साल बाद भी जब देश की आधी आबादी अपने ही शहर में खुद को महफूज़ न माने, तो इसे हमें सामाजिक विफलता मान लेना चाहिए। 

‘नेशनल एनुअल रिपोर्ट एंड इंडेक्स ऑन वीमेन सेफ्टी  नारी 2025’ के ताज़ा आंकड़े ने सभी को हैरान कर दिया है। यह रिपोर्ट इस चिंताजनक सच्चाई को उजागर करते हैं। आपको बता दें कि इस रिपोर्ट में देश के 31 शहरों की 12,770 महिलाओं के अनुभवों को शामिल किया गया, जिनमें 40% महिलाओं ने साफ तौर पर कहा है कि वे शहरी क्षेत्रों में खुद को असुरक्षित महसूस करतीं हैं।

इन आंकड़ों से आपको सबसे ज्यादा हैरानी होगी कि साल 2024 में 7% महिलाओं को छेड़छाड़ जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ा है, जो कि NCRB के 2022 के आंकड़ों से 100 गुना ज्यादा है। मतलब 2 साल में महिलाएं 100 गुना ज्यादा असुरक्षित हो गई हैं। इसका मतलब है कि ज़्यादातर मामले तो रिपोर्ट ही नहीं किए जाते, और जो डेटा हमारे सामने आता है, वह असल स्थिति से बहुत पीछे है।

छेड़छाड़ और उत्पीड़न के जो रूप सामने आए, उनमें घूरना, फब्तियां कसना, अश्लील टिप्पणियाँ, भीड़ में जानबूझकर छूना आदि शामिल है। महिलाओं ने इन घटनाओं के लिए जिन समस्याओं को जिम्मेदार ठहराया है उसमें खराब स्ट्रीट लाइट्स, असुरक्षित सार्वजनिक परिवहन और कमजोर शहरी ढांचा है।

सबसे असुरक्षित और सुरक्षित शहर (The most unsafe and safest cities)

अब बात आती है कि किन शहरों में ऐसी घटनाएं ज्यादा होती है। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली, कोलकाता, रांची, श्रीनगर और फरीदाबाद जैसे शहर महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित माने गए हैं। जबकि मुंबई, कोहिमा, विशाखापट्टनम, भुवनेश्वर, आइजोल, गंगटोक और ईटानगर जैसे शहरों को महिलाओं के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित माना गया है।

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क्यों नहीं होती शिकायतें दर्ज?

रिपोर्ट बताती है कि केवल 22% महिलाएं ही उत्पीड़न की शिकायत करती हैं। बाकी महिलाएं डर, समाजिक तानों और बदनामी के कारण चुप रह जाती हैं। इससे भी चिंताजनक तथ्य यह है कि 53% महिलाओं को यह तक नहीं पता कि उनके कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा के लिए कोई POSH पॉलिसी है या नहीं, जबकि यह कानूनन अनिवार्य है।

रिपोर्ट का उद्देश्य और संदेश

इस रिपोर्ट के सामने आने पर राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजय किशोर रहाटकर ने कहा कि यह रिपोर्ट महिलाओं की असली सुरक्षा संबंधी चिंताओं को उजागर करती है। वहीं, पीवैल्यू एनालिटिक्स के एमडी प्रह्लाद राउत ने इसे ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में एक मार्गदर्शक दस्तावेज भी बताया है।

महिलाओं की सुरक्षा अब केवल कानून या पुलिसिंग का मुद्दा नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतना का सवाल है। जब तक हर महिला सड़कों, दफ्तरों और ऑनलाइन स्पेस में खुद को सुरक्षित न महसूस करे, तब तक विकास अधूरा है। यह रिपोर्ट हमें केवल डर नहीं दिखाती, बल्कि सरकार को, समाज को, और हम सभी को जिम्मेदारी का बोध भी कराती है। 

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Shivani Singh
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