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बदन तोड़कर फिरंगियों से उगलवा लिया सारा सच, आजादी के लिए तवायफों ने झेलीं ऐसी-ऐसी तकलीफें, जानकर छलक पड़ेंगे आंसू

Tawaif Ka Yogdan: देश को अंग्रेजों से आजाद करवाने के लिए सैकड़ों लोगों ने अपनी जान कुर्बान कर दी। इनमे काफी सैनिक, कई राजनीतिक लीडर्स तो कई जासूस शामिल हैं।लेकिन क्या आप जानते हैं देश को आजादी दिलाने के लिए तवायफों ने भी अहम भूमिका निभाई है।

Published by Heena Khan

Tawaif Ka Yogdan: देश को अंग्रेजों से आजाद करवाने के लिए सैकड़ों लोगों ने अपनी जान कुर्बान कर दी। इनमे काफी सैनिक, कई राजनीतिक लीडर्स तो कई जासूस शामिल हैं।लेकिन क्या आप जानते हैं देश को आजादी दिलाने के लिए तवायफों ने भी अहम भूमिका निभाई है। जी हाँ, 1857 के विद्रोह से लेकर 1947 में देश की आजादी तक तवायफें भी इस स्वतंत्रता संग्राम में लड़ती रही हैं। कभी ये महिलाएं प्रत्यक्ष रूप से तो कभी गुप्त तरीके से योगदान देती रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देते हुए इन तवायफों ने जासूसी भी की है। उन्होंने महिलाओं का समूह भी बनाया है, खादी पहनी है और धन इकट्ठा करने के लिए संगीत कार्यक्रम भी आयोजित किए हैं। तो आइए जान लेते हैं कि देश को आजाद करवाने में तवायफों ने क्या-क्या किया?

तवायफों का योगदान

मायूसी की बात तो ये है कि, इतिहास के उस दौर में तवायफों ने कितना योगदान दिया इसका जिक्र आज कोई नहीं करता। न ही इनके योगदान पर कोई किताब छपी। तो आज हम आपको अपने आर्टिकल के माध्यम से बताएंगे कि तवायफों ने देश को आजादी दिलाने के लिए क्या-क्या किया। जब उनका व्यवसाय, जो कभी एक कला के रूप में स्थापित था, महज वेश्यावृत्ति और सस्ते मनोरंजन तक सीमित था। जिसके कारण न तो तवायफों को उनकी पहचान मिल सकी और न ही उनके योगदान को स्वीकार किया गया।

अंग्रेजों ने दिया इन्हे गंदा नाम

सिर्फ तवायफ नहीं , दक्षिण भारत में देवदासी और बंगाल में इन्हे नायिका के नाम से भी जाना जाता है। आपको बता दें, धनी परिवारों के लड़कों को कला और तौर-तरीकों की शिक्षा के लिए वेश्याओं के पास भेजा जाता था। लेकिन जैसे-जैसे उत्तर भारत में रियासतों का प्रभुत्व कम होने लगा और ईस्ट इंडिया कंपनी मज़बूत होती गई, ठुमरी, ग़ज़ल, दादरा या कथक जैसी कलाओं में पारंगत मानी जाने वाली ये महिलाएँ ‘नाचवाली’ कहलाने लगीं और उनका काम वेश्यावृत्ति तक सीमित हो गया।

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हनीट्रैप का सहारा लेकर अंग्रेजों को बनाया उल्लू

1857 के विद्रोह के दौरान, जिसे हम सरकारी दस्तावेज़ के तौर पर आज़ादी की लड़ाई की शुरुआत मानते हैं, लखनऊ की तवायफ़ों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए हनीट्रैप का सहारा लिया था, जहाँ उन्होंने अंग्रेज़ ग्राहकों से ख़ास संबंध बनाए और उनसे ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियों की जानकारी लेकर क्रांतिकारियों तक पहुँचाई। तवायफ़ों ने ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा पीछा किए जा रहे क्रांतिकारियों को संगीतकार या गायक के रूप में महीनों तक अपने अड्डे पर पनाह दी थी।

अजीजनबाई की अहम भूमिका

जब महारानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, तो अजीजनबाई नाम की एक वेश्या ने तात्या टोपे और नाना साहब के साथ कानपुर में गंगाजल को साक्षी मानकर शपथ ली थी कि वह ब्रिटिश हुकूमत को जड़ से मिटा देंगी। कहा जाता है कि अजीजनबाई ने इसके लिए युवतियों की एक सेना बनाई थी। वे युवतियाँ पुरुषों के वेश में घोड़ों पर सवार होकर तलवारें लिए घूमती थीं और उत्तर भारत के युवाओं को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए उकसाती थीं। इसी अजीजनबाई पर एक पूरी वेब सीरीज़ बनाई जा सकती है, जिसके बारे में ब्रिटिश गजेटियर में एक रक्तपिपासु राक्षसी के रूप में लिखा गया है।

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