नजीर हुसैन को क्यों कहा जाता है भोजपुरी सिनेमा का पितामह? कैसे सबसे सफल फिल्म बन गई ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो’

Nazir Hussain: भोजपुरी सिनेमा के जनक नजीर हुसैन की कोशिशों की बदौलत भोजपुरी सिनेमा ने इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल की. आज भोजपुरी सिनेमा की जो पहचान है वो सिर्फ और सिर्फ नजीर हुसैन की वजह से है.

Published by Sohail Rahman

Bollywood Cinema Success Story: अगर आपसे पूछा जाए कि भोजपुरी सिनेमा के पितामह कौन हैं? तो क्या आप इसका जवाब दे पाएंगे. अगर आपके पास इसका जवाब नहीं है तो चलिए आज हम आपको भोजपुरी सिनेमा से जुड़े काफी अहम जानकारी के रूबरू कराते हैं. जिसके बारे में शायद ही किसी को पता हो. भोजपुरी सिनेमा को बुलंदियों तक पहुंचाने का श्रेय नजीर हुसैन को जाता है. जिन्होंने भोजपुरी सिनेमा के लिए वो किया है. जो आज तक शायद ही किसी ने किया हो या भविष्य में भी ऐसा कर पाए.

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के उसिया गांव में 15 मई 1922 को जन्मे नजीर हुसैन को भोजपुरी सिनेमा का जनक माना जाता है. गांव की सादगी भरे परिवेश में पले-बढ़े नजीर हुसैन का भोजपुरी भाषा और संस्कृति से गहरा नाता था, जिसने उन्हें भोजपुरी सिनेमा का “पितामह” बना दिया. उनकी कला और व्यक्तित्व में गांव की मिट्टी की महक साफ झलकती थी और यहीं से भोजपुरी सिनेमा की नींव रखने का उनका सपना जन्मा.

नजीर हुसैन को कैसे मिली भोजपुरी फिल्म बनाने की प्रेरणा? (How did Nazir Hussain get the inspiration to make Bhojpuri films?)

साल 1960 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से मुलाकात के दौरान नजीर हुसैन को भोजपुरी में फिल्में बनाने की प्रेरणा मिली. राष्ट्रपति ने उनसे कहा कि भोजपुरी भाषा में भी फिल्में बननी चाहिए. इसी प्रेरणा से नजीर ने पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो’ (1963) का निर्माण किया, जो भोजपुरी सिनेमा की पहली फिल्म बनी और इसे एक सशक्त पहचान दी. इस ऐतिहासिक पहल ने नजीर हुसैन को भोजपुरी सिनेमा का संस्थापक बना दिया.

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नजीर हुसैन ने 500 से अधिक फिल्मों में किया काम (Nazir Hussain worked in over 500 films)

कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नजीर हुसैन ने अपने 37 साल के करियर में 500 से अधिक फिल्मों में काम किया. हालांकि उनके इस महान योगदान के लिए उन्हें कभी किसी बड़े अवॉर्ड से सम्मानित नहीं किया गया. लेकिन फिर भी बिना किसी लालच के लगातार भोजपुरी सिनेमा के लिए काम करते रहे और भोजपुरी सिनेमा को स्थापित कर अपनी कला और लगन से उसे नए आयाम तक पहुंचाया. उनका योगदान सदैव अमर रहेगा, और वे हमेशा भोजपुरी सिनेमा के पथप्रदर्शक के रूप में याद किए जाएंगे.

‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो’ कैसे बनी एतिहासिक फिल्म? (How did ‘Ganga Maiya Tohe Piyari Chadhaibo’ become a historic film?)

जब 22 फरवरी, 1963 को पटना के एक सिनेमा हॉल में फिल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो’ रिलीज हुई तो किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह फिल्म इतनी धूम मचाएगी. फिल्म देखने वालों की भीड़ लगातार बढ़ने लगी. लोगों के ऊपर इस फिल्म की दिवानगी इस कदर चढ़ी कि लोग इस फिल्म को देखने के लिए थिएटर के बाहर लंबी कतारों में खड़े होने लगे. जब भारी भीड़ की वजह से टिकट नहीं मिलती तो लोग थिएटर के बाहर ही सोते थे. यहीं नहीं लोग इस फिल्म को देखने के लिए दूर-दूर से बैलगाड़ियों में बैठकर आते थे और थिएटर में घुसने से पहले अपनी चप्पलें भी उतार देते थे.

फिल्म ने जीते कई अवार्ड (The film won several awards)

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ‘’गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो’ बहुत ज्यादा मशहूर हुई. इस फिल्म के गाने तो तुरंत हिट हो गए थे. फिल्म ने कोलकाता में सिल्वर जुबली मनाई और इस सेलिब्रेशन के दौरान इसे कई अवॉर्ड से सम्मानित किया गया, जिसमें बेस्ट फिल्म, बेस्ट एक्ट्रेस, बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर, बेस्ट लिरिक्स, बेस्ट स्टोरी और बेस्ट प्लेबैक सिंगर शामिल हैं.

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