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नाम लिखवाइए साहब देखेंगे! 3 महीने से सूखी है ग्रामीणों की थाली; सूरजपुर में सिस्टम फेल

Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी पीएम आवास योजना का अधूरे मकानों और टूटती उम्मीदों का प्रतीक बनती जा रही है. ग्रामीण अभी भी अपने घर बनने की उम्मीद लगाए हुए हैं.

By: Preeti Rajput | Published: April 19, 2026 6:29:23 PM IST



Chhattisgarh News: सरगुजा अंचल में छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी पीएम आवास योजना का जमीनी सच सूरजपुर जिले के गांवों में कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है. खासकर प्रतापपुर ब्लॉक में यह योजना अब अधूरे मकानों और टूटती उम्मीदों का प्रतीक बनती जा रही है. यहां के सबसे पिछड़ी जनजाति के गरीब परिवार, जो अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह मजदूरी पर निर्भर हैं, आज दोहरी मार झेल रहे हैं—एक तरफ अधूरा मकान, दूसरी तरफ रुकी हुई मजदूरी.

ग्रामीणों का अधूरा सपना 

ग्रामीणों का कहना है कि पहली किस्त मिलने के बाद उन्होंने किसी तरह कर्ज लेकर और मेहनत मजदूरी कर अपने मकानों की दीवारें खड़ी कर लीं. कई जगहों पर डीपीसी तक निर्माण भी पूरा हो गया, लेकिन इसके बाद मिलने वाली दूसरी किस्त पिछले तीन महीनों से अटकी हुई है. नतीजा यह है कि निर्माण कार्य पूरी तरह ठप हो गया है और परिवार अधूरे घरों के बीच असहाय बैठे हैं.

कर्ज लेकर गुजारा कर रहे मजदूर 

प्रतापपुर ब्लॉक में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर बताई जा रही है, जहां करीब 150 से अधिक हितग्राहियों की राशि लंबित है. इतना ही नहीं, इन्हीं परिवारों को मनरेगा के तहत मिलने वाली मजदूरी भी तीन से चार महीने से नहीं मिली है, जिससे उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. कई परिवारों में भूखमरी जैसी स्थिति बनती जा रही है और लोग कर्ज लेकर गुजारा करने को मजबूर हैं.

ग्रामीणों ने बताया सच 

ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने कई बार जनपद और जिला स्तर के अधिकारियों को इस समस्या से अवगत कराया, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई. उनका कहना है कि शासन की योजना का लाभ आधा-अधूरा मिलने से उनकी स्थिति और खराब हो गई है. इस पूरे मामले में जब जनपद पंचायत के सीईओ अनिल तिवारी से बात की गई, तो उन्होंने कहा, राशि सभी को मिल रही है, जिनका पैसा नहीं मिला है उनका नाम लिखवा दीजिए, मैं दिखवाता हूं.

आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर 

सीईओ का यह बयान जहां एक ओर आश्वासन देता नजर आता है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी खड़ा करता है कि जब बड़ी संख्या में हितग्राही महीनों से परेशान हैं, तो जिम्मेदार अधिकारी इस स्थिति से अब तक अनजान कैसे हैं?ग्रामीणों का कहना है कि यदि वास्तव में सभी को राशि मिल रही है, तो फिर प्रतापपुर ब्लॉक में इतनी बड़ी संख्या में लोग क्यों परेशान हैं? क्या यह आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर है, या फिर व्यवस्था की खामियों का नतीजा?

अधूरे घर और टूटती उम्मीद

आने वाले समय में मानसून भी दस्तक देने वाला है. ऐसे में यदि अधूरे मकानों का निर्माण समय पर पूरा नहीं हुआ, तो ये ढांचे बारिश में क्षतिग्रस्त हो सकते हैं, जिससे गरीब परिवारों को और अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा. अब प्रभावित हितग्राहियों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर जल्द से जल्द लंबित राशि जारी की जाए और मनरेगा मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित किया जाए.

यह केवल एक योजना की देरी का मामला नहीं, बल्कि उन गरीब और आदिवासी परिवारों के जीवन का सवाल है, जिन्होंने सरकारी भरोसे पर अपने सपनों का घर बनाना शुरू किया था. अब देखना यह है कि प्रशासन इन अधूरे घरों और टूटती उम्मीदों को कब तक पूरा आशियाना दे पाता है.

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