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अखिलेश यादव का बड़ा दांव, फूलन देवी की बहन को बड़ी जिम्मेदारी; 1993 वाला मास्टरस्ट्रोक दोहराने की कोशिश

Phoolan Devis sister Rukmini Nishad: माना जा रहा है कि अखिलेश यादव 1993 में मुलायम सिंह यादव द्वारा खेले गए 'मल्लाह कार्ड' को दोहराने की कोशिश कर रहे हैं.

By: Shubahm Srivastava | Published: March 25, 2026 11:08:04 PM IST



Rukmini Nishad With Akhilesh Yadav: उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों को देखते हुए समाजवादी पार्टी (सपा) अपनी रणनीति को मजबूत करने में जुट गई है. इसी कड़ी में पार्टी ने दस्यु सुंदरी रहीं फूलन देवी की बहन रुक्मिणी निषाद को प्रदेश महिला सभा का अध्यक्ष नियुक्त किया है. इस फैसले को सपा का बड़ा सामाजिक और राजनीतिक दांव माना जा रहा है. माना जा रहा है कि अखिलेश यादव 1993 में मुलायम सिंह यादव द्वारा खेले गए ‘मल्लाह कार्ड’ को दोहराने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे निषाद और मल्लाह समुदाय के वोटों को साधा जा सके.

1993 का ‘फूलन फैक्टर’ 

साल 1993 में सपा-बसपा गठबंधन के दौरान मुलायम सिंह यादव ने मल्लाह समुदाय को साधने के लिए फूलन देवी की रिहाई का वादा किया था. इस रणनीति का बड़ा असर देखने को मिला और मल्लाह बहुल सीटों पर गठबंधन को शानदार सफलता मिली. जालौन जिले की उरई, कोंच, माधोगढ़ और कालपी जैसी सीटों पर गठबंधन ने जीत दर्ज की थी.

बाद में 1994 में मुलायम ने अपना वादा निभाते हुए फूलन देवी को राजनीति में उतारा. 1996 में वह सांसद बनीं, 1998 में हार गईं, लेकिन 1999 में फिर जीतकर संसद पहुंचीं. हालांकि उसी कार्यकाल के दौरान उनकी हत्या कर दी गई, जिससे उनका राजनीतिक सफर अचानक खत्म हो गया.

रुक्मिणी निषाद का संघर्षपूर्ण जीवन

रुक्मिणी निषाद, जो फूलन देवी की बड़ी बहन हैं, ने जीवन में काफी संघर्ष झेला है. वह उस दौर में भी फूलन के साथ खड़ी रहीं जब वह बीहड़ों में फरार थीं. इस दौरान उन्हें पुलिस प्रताड़ना और सामाजिक दुश्मनी का सामना करना पड़ा. उनके पति रामपाल की हत्या भी इसी संघर्ष का परिणाम मानी जाती है.

बेहद गरीब परिवार में विवाह के बाद उन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपने बच्चों का पालन-पोषण किया. मात्र चौथी कक्षा तक शिक्षित रुक्मिणी ने अपने दम पर परिवार को संभाला और बच्चों को पढ़ाया. उनके एक बेटे ने मध्य प्रदेश पुलिस में सिपाही की नौकरी पाई, जबकि दूसरा खेती-बाड़ी से जुड़ा है.

राजनीति में वापसी और सपा में भूमिका

फूलन देवी की हत्या के बाद रुक्मिणी कुछ समय तक सपा से जुड़ी रहीं, लेकिन बाद में उन्होंने ‘एकलव्य सेना’ के जरिए सामाजिक काम शुरू किया. इसके अलावा वह प्रगतिशील मानव समाज पार्टी में भी सक्रिय रहीं. करीब छह साल पहले उन्होंने फिर से सपा का दामन थामा और लखनऊ में अखिलेश यादव की मौजूदगी में पार्टी में शामिल हुईं. उन्हें महिला सभा का सचिव बनाया गया था और 2022 व 2024 के चुनावों में मल्लाह बहुल क्षेत्रों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही. रथयात्राओं में उन्हें प्रमुखता से आगे रखा गया, जिससे उनकी राजनीतिक पहचान और मजबूत हुई.

क्या सपा को मिलेगा फायदा?

रुक्मिणी निषाद को महिला सभा का अध्यक्ष बनाए जाने से सपा को निषाद, मल्लाह और बिंद समुदाय के वोटों में फायदा मिलने की उम्मीद है. खासकर औरैया, इटावा, जालौन और कानपुर देहात जैसे जिलों में इसका असर देखने को मिल सकता है.

रुक्मिणी ने अपने बयान में कहा कि महिलाओं को सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनने की जरूरत है. उन्होंने यह भी दावा किया कि बहुचर्चित बेहमई कांड में फूलन देवी शामिल नहीं थीं. रुक्मिणी का कहना है कि वह महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान के लिए लगातार काम करती रहेंगी.

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