Babu Lohar Jyoti Love Story: बिहार के दशरथ मांझी याद हैं ना! जिन्होंने उस पहाड़ को कई सालों बाद तोड़कर रास्ता बना दिया, जिससे गिरकर और इलाज नहीं मिलने से उनकी पत्नी पत्नी फगुनिया या फाल्गुनी देवी की मौत हो गई. वह इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्हें ‘माउंटेन मैन’ के नाम से जाना जाता है. पत्नी के प्रति प्यार के ऐसे उदाहरण देश क्या दुनिया में भी कम ही मिलते हैं. अब ओडिशा से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है. यहां पर बीमार पत्नी के लिए 300 किलोमीटर का संघर्षपूर्ण सफर करने वाले बाबू लोहार ने पत्नी से प्रेम की अनूठी दास्तान पेश की है. बाबू लोहार कोई जवान शख्स नहीं, बल्कि वह बूढ़े हो चुके हैं, लेकिन पत्नी के प्रति समर्पण और प्रेम के लिए उन्होंने वह कर डाला, जो आजकल के युवाओं के लिए सबक है जो जरा सी बात पर हौसला खो देते हैं.
कई सालों से लकवाग्रस्त हैं पत्नी
पूरा मामला ओडिशा के संभलपुर जिले का है. जिले के गोल बाजार क्षेत्र के मोदीपाड़ा के रहने वाले 75 साल के बाबू लोहार की 70 वर्षीय पत्नी ज्योति लोहार बीमार हैं. वह लंबे समय से लकवाग्रस्त हैं. 70 वर्ष की उम्र कोई मामूली नहीं होती है. इतनी उम्र में वह चलना-फिरना तो छोड़िये उठने-बैठने में भी असमर्थ हैं, क्योंकि इसके लिए भी उन्हें किसी के सहारे की जरूरत पड़ती है. हालत अधिक खराब हुई तो पहले बाबू लोहार उन्हें संबलपुर के एक अस्पताल ले गए. यहां पर डॉक्टरों ज्योति की स्थिति को देखते हुए बेहतर इलाज के लिए कटक स्थित एससीबी मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया.
इलाज तो कराना ही है, लेकिन बाबू लोहार के सामने एंबुलेंस की समस्या आ गई. पैसे भी नहीं हैं. इस पर उन्होंने एक पुराना माल ढोने वाला रिक्शा लिया. इसके बाद उस पर पत्नी को लिटा दिया. फिर करीब 300 किलोमीटर दूर कटक की ओर निकल पड़े. 300 किलोमीटर का सफर कम नहीं होता. उन्होंने कई दिनों तक रिक्शा खींचा. रास्ते में कुछ लोगों ने सहारा दिया तो कुछ ने भोजन उपलब्ध कराया. इस दौरान यानी रास्ते में उन्हें आर्थिक मदद भी मिली.
कई दिनों बाद पहुंचे कटक
आखिरकार कटक पहुंचकर बाबू लोहार ने पत्नी ज्योति का इलाज कराया गया और इसके बाद दोनों संबलपुर लौटने लगे तो चौद्वार के पास एक अज्ञात वाहन ने उनके रिक्शा को टक्कर मार दी. टक्कर से पत्नी ज्योति लोहार फिर घायल हो गईं. इसके बाद उन्हें तुरंत टांगी स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार किया गया. लोगों की मदद से फिर रिक्शा पर पत्नी को लिटाया और किसी तरह संभलपुर पहुंचे. इससे यह भी जाहिर होता है कि शहरों में जहां इंसानियत का जनाजा निकला गया लगता है, वहीं स्थानीय या गांवों में भाई-चारा और मदद की भावना जिंदा है. यही भावना बाबू की ज्योति की जिंदगी के लिए अच्छी साबित हुई.