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Premanand Ji Maharaj: क्या हमें सातों जन्म में इसी जन्म वाला पति मिल सकता है? जानें प्रेमानंद जी महाराज का क्या कहना है

Premanand Ji Maharaj: प्रेमानंद जी महाराज के अनमोल वचन लोगों को उनके जीवन के प्रेरित करते हैं. नाम जप, भगवान की सेवा, माता-पिता की सेवा करना ही परम सेवा है. जानते हैं प्रेमानंद जी महाराज से क्या हमें सातों जन्म में इसी जन्म वाला पति मिल सकता है?

By: Tavishi Kalra | Published: January 16, 2026 8:06:39 AM IST



Premanand Ji Maharaj: प्रेमानंद जी महाराज, एक हिंदू तपस्वी और गुरु हैं, जो राधावल्लभ संप्रदाय को मानते हैं. प्रेमानंद जी महाराज अपनी भक्ति, सरल जीवन, और मधुर कथाओं के लिए लोगों में काफी प्रसिद्ध हैं. हर रोज लोग उनके कार्यक्रम में शामिल होते हैं जहां वह लोगों के सवालों के जवाब देते हैं.हजारों लोगों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते हैं. उनके प्रवचन, जो दिल को छू जाते हैं, ने उन्हें बच्चों और युवाओं सहित विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया है. प्रेमानंद जी महाराज नाम जप करने के लिए के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं और साफ मन से अपने काम को करें और सच्चा भाव रखें.

भक्त के सवाल पर प्रेमानंद जी महाराज ने बताया कि क्या हमें अगले सात जन्म में भी यही पति मिल सकता है क्या

प्रेमानंद जी महाराज का मानना है कि ऐसा बिलकुल भी नहीं हो सकता कि आपको इस जन्म वाला पति अगले सातों जन्म में मिले, यह फिल्मी स्टेज नहीं है.

एक उपाय किया जा सकता है अगर आप भगवान की आराधना करें और भगवान से वर मांगे जो मेरे पति हैं वो सात जन्म तक मेरे पति बनें और वो आशीष दे दें तो यह संभव हो सकता है, नहीं तो नहीं हो सकता. क्योंकि दोनों के कर्म अलग-अलग हैं. दोनों का प्राबद्ध अलग-अलग है, दोनों के संचित अलग-अलग हैं जो इस जन्म में पति बना वो अगले जन्म में पुरूष बनेगा यह बिलकुल आवश्यक नहीं है.

प्रेमानंद जी महाराज ने एक कहानी के जरिए बताया कि एक की पत्नी बड़ी भक्त थी, वो पत्नी से बहुत प्यार करते थे, पर पत्नी गुरु जी की आज्ञा से चलती थीं, पति को संतों से प्यार नहीं था, वो पत्नी से प्रेम करते थे. एक दिन पत्नी ने प्रेम से कहा कि हमारी बात मानेंगे कि आप हमारे गुरु जी से दीक्षा ले लिजिए. क्योंकि हम दीक्षित है और आपने दीक्षा नहीं तो आपका हमारा प्रेम अधूरा है. तो पति ने कहा ठीक है गुरु जी को बुला लो, गुरु जी आएं, दीक्षा लेने के लिए गंगा स्नान करने के लिए चले तो  गांव के लोगों ने पूछा तो उन्हें बताया, फिर वह वापस आ गए ओर बोले की मुझे नहीं लेना दीक्षा, कालातंर में दोनों का शरीर छूटा, तो पति आस्त होने के कारण उसका मोक्ष नहीं हुआ, और राजा की राजकुमारी के रूप में जन्में, पूर्व में गीता जी के महत्व की महिमा आती थी उसका भाग है यह, और वो पत्नी के प्यार के कारण जहां वो राजकुमारी जन्मी वहीं हथनी से पुत्र के रूप में प्रकट हुआ, हाथी का शावक जब वह नव युवक हाथी आया और श्रृंगार करके राज सवारी निकली , राजकुमारी राज सिंहासन पर निकली तक उसके देखा तो पूरी स्मृति जाग्रत हो गई कि यह तो मेरी पत्नी है. अब यह राजकुमारी और हाथी का मिलन कैसे हो सकता है. 

जब राजा ने अपनी राजकुमारी का स्वयंवर रचा, जैसे ही स्वंयवर की घोषणा हुई, हाथी ने खाना पीना, सब कुछ छोड़ दिया, वैद्य को दिखाया तो वैद्य ने कहा कोई रोग नहीं है, राजकुमारी विज्ञान संपन्न थी, क्योंकि भजन करती थी, उसने कहा इसकी औषधि मुझे पता है एक बार मुझे देखने दो, नजदीक गई और कान में कहा कि बोला कि गुरुदेव से दीक्षा ले लो, नहीं लिया तो हाथी की योनि को प्राप्त हो, सकुचाओ मत स्वयंवर में तुम्हारे गले में माला डाल दूंगी और इस जन्म में इतना भजन करूंगी कि अगले जन्म में हम फिर मिलेंगे, उसने ऐसा ही किया भजन की प्रक्रिया से भजन करके अपने पति को हाथी की युनि से मुक्त करा लिया. तप और भजन से सब संभव है. कल हम सब अलग-अलग होंगे.

अगले जन्म का पता नहीं है. भगवान का वरदान सबसे ऊपर है. भगवान के विधान के सिवा दूसरा कोई विधान नहीं है.

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Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. Inkhabar इसकी सत्यता का दावा नहीं करता 

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