Second Hand Phone Tips: आज स्मार्टफोन सिर्फ कॉल और मैसेज तक सीमित नहीं रहे—वे बैंकिंग, सोशल मीडिया, काम, गेमिंग, शूटिंग और रोजमर्रा के हर काम का केंद्र बन चुके हैं. ऐसे में लोग हर साल नए मॉडल खरीदते हैं, और पुराना फ़ोन सेकेंड-हैंड मार्केट में पहुंच जाता है. यह मार्केट इतना बड़ा और तेज़ है कि अक्सर खरीदार बजट बचाने के लिए इस्तेमाल किए गए फ़ोन खरीदना पसंद करते हैं. लेकिन असली समस्या यहीं आती है—फ़ोन वास्तव में जितना पुराना है, उसकी जानकारी मिलनी बेहद मुश्किल होती है क्योंकि ज़्यादातर विक्रेता यह दावा करते हैं कि उन्होंने फोन “बहुत कम” इस्तेमाल किया, “सिर्फ कुछ महीनों” पुराना है, या “नया जैसा” है.
जबकि सच यह भी हो सकता है कि फोन दो-तीन साल से चल रहा हो, बैटरी खराब हो चुकी हो, पानी में डूबा हो, या पहले ही रिपेयर होकर नया रूप दिया गया हो. बाहरी रूप देखकर फोन की असली हालत और उसकी वास्तविक उम्र का अंदाज़ा लगा पाना काफी मुश्किल होता है, जब तक कि उसकी एक्टिवेशन डेट न जांची जाए.
सेकेंड-हैंड फोन की छिपाई जा रही उम्र
असल में सेकेंड-हैंड बाजार में फोन की असली उम्र छुपाना बहुत आसान है. कई दुकानों में लोग फेक बिल बना देते हैं, फोन की बॉडी बदल देते हैं, टूटा-फूटा फोन रीफर्बिश्ड करके ऐसे बेचते हैं मानो वह नया निकला हो. यहां तक कि पुराने फोन को नए बॉक्स में पैक कर दिया जाता है और खरीदार को लगता है कि शानदार सौदा मिल गया. यही वजह है कि फोन कब खरीदा गया, इस बात से ज्यादा मायने रखता है कि फोन कब पहली बार चालू हुआ, यानी उसकी एक्टिवेशन डेट. यही वह तारीख है जब फोन पहली बार कंपनी के सर्वर पर रजिस्टर होता है, और यह बिल, बॉक्स या मौखिक दावा—किसी भी चीज़ से ज्यादा भरोसेमंद होती है. एक्टिवेशन डेट ही असली यूज़-एज बताती है—फोन कब से रोजमर्रा की जिंदगी में चल रहा है, उसकी बैटरी कितनी थक चुकी होगी, और उसकी वारंटी कब खत्म होगी.
कैसे जानें फोन की असल उम्र?
फोन की उम्र जानने का सबसे तरीका IMEI नंबर की जांच है. हर फोन के पास 15 अंकों का एक अनोखा IMEI होता है, जिसे *#06# डायल करके या सेटिंग्स के ‘अबाउट फोन’ सेक्शन में देखा जा सकता है. इस IMEI को कंपनी की वेबसाइट, वारंटी चेक पोर्टल या किसी भरोसेमंद ऑनलाइन डेटाबेस पर डालते ही फोन की असली उम्र, एक्टिवेशन डेट, वारंटी स्टेटस, ब्लैकलिस्ट स्थिति और कभी-कभार सर्विस इतिहास तक मिल जाता है. इसी तरह बैटरी हेल्थ भी बड़े सच बताती है—नई बैटरी 97-100% के बीच होती है, जबकि 1-2 साल पुराने फोन में यह 80-90% तक गिर जाती है. अगर विक्रेता कहे कि फोन “चार महीने” पुराना है और बैटरी 80% निकले, तो झूठ स्पष्ट है.
फोन की एक्टिवेशन डेट खोल देगी सारे राज़
मामला यहीं खत्म नहीं होता—कई लोग बॉक्स और बिल देखकर भरोसा कर लेते हैं, लेकिन बॉक्स किसी दूसरे फोन का हो सकता है और बिल आसानी से नकली बन सकता है. इसके मुकाबले एक्टिवेशन डेट कोई धोखा नहीं देती. बहुत से लोग यह नहीं समझते कि भले ही फोन हाल ही में खरीदा गया हो, लेकिन अगर वह दो साल पहले एक्टिवेट हुआ था, तो उसकी बैटरी, प्रोसेसर और सॉफ्टवेयर पहले से ही दो साल बूढ़े हो चुके हैं. पुरानी एक्टिवेशन डेट का मतलब है कि फोन अपडेट धीरे-धीरे कम मिलने लगेंगे, बैटरी बैकअप गिरता जाएगा, और फोन जल्द ही धीमा होने लगेगा. फ्यूचर रीसेल वैल्यू भी लगभग आधी हो जाती है.
सेकेंड-हैंड फोन लेते समय जरूर पूछें ये सवाल
सेकेंड-हैंड फोन लेते समय हमेशा कुछ सवाल पूछने चाहिए—क्या बैटरी बदली गई है? फोन कभी रिपेयर हुआ है? सर्विस सेंटर हिस्ट्री मौजूद है? IMEI और बॉक्स पर नंबर मैच करते हैं या नहीं? अगर विक्रेता IMEI देने से भी बचता है तो साफ है कि कुछ छिपाया जा रहा है. इसके बावजूद सेकेंड-हैंड फोन खरीद हमेशा बुरा विचार नहीं है—अगर एक्टिवेशन डेट कम हो, बैटरी हेल्थ 90% से ऊपर हो, फोन 6-12 महीने से ज्यादा पुराना न हो, और कोई रिपेयर हिस्ट्री न हो तो सौदा फायदे का हो सकता है. इसी तरह ब्रांड-सर्टिफाइड रीफर्बिश्ड फोन, Amazon Renewed प्रीमियम मॉडल या Apple/सैमसंग जैसी कंपनियों के आधिकारिक रीफर्ब स्टोर ज्यादा सुरक्षित होते हैं.
सेकेंड-हैंड फोन लेने से बचना चाहिए अगर बैटरी हेल्थ 85% से कम हो, एक्टिवेशन को दो-तीन साल गुजर चुके हों, फोन पानी में डूबा हो, रिपेयर हो चुका हो, या ऑनलाइन रिपोर्ट में चोरी/ब्लैकलिस्ट मार्क हो. फोन चाहे कितना भी चमकदार लग रहा हो—पुराना फोन पुराना ही है, और लंबे समय तक आपके साथ नहीं चलेगा.
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