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Premanand Ji Maharaj: परिवार पर दुख और तकलीफ आए तो उस समय कैसे भक्ति दृढ़ करें, जानें प्रेमानंद जी महाराज से जानें

Premanand Ji Maharaj: प्रेमानंद जी महाराज के अनमोल वचन लोगों को उनके जीवन के प्रेरित करते हैं. नाम जप, भगवान की सेवा, माता-पिता की सेवा करना ही परम सेवा है. जानते हैं प्रेमानंद जी महाराज से परिवार पर दुख और तकलीफ आए तो उस समय कैसे भक्ति दृढ़ करें.

By: Tavishi Kalra | Published: January 1, 2026 8:07:11 AM IST



Premanand Ji Maharaj: प्रेमानंद जी महाराज, एक हिंदू तपस्वी और गुरु हैं, जो राधावल्लभ संप्रदाय को मानते हैं. प्रेमानंद जी महाराज अपनी भक्ति, सरल जीवन, और मधुर कथाओं के लिए लोगों में काफी प्रसिद्ध हैं. हर रोज लोग उनके कार्यक्रम में शामिल होते हैं जहां वह लोगों के सवालों के जवाब देते हैं.हजारों लोगों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते हैं. उनके प्रवचन, जो दिल को छू जाते हैं, ने उन्हें बच्चों और युवाओं सहित विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया है. प्रेमानंद जी महाराज नाम जप करने के लिए के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं और साफ मन से अपने काम को करें और सच्चा भाव रखें.

भक्त के सवाल पर प्रेमानंद जी महाराज ने बताया कि परिवार पर दुख और तकलीफ आए तो उस समय कैसे भक्ति दृढ़ करें, जानें प्रेमानंद जी महाराज से जानें

प्रेमानंद जी का मानना है कि पूरा बंधन ममता है, इसीलिए भगवान ने कहा-

“जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥

सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहिं बाँधि बर डोरी॥” 

यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस से ली गई है, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति के जीवन में ये सभी रिश्ते (शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार सहित) मोह के धागे (ममता के बंधन) से बंधे होते हैं. भगवान कहते हैं कि इन सभी रिश्तों की ममता के धागों को बटोरकर अपने मन को श्री राम के चरणों में बांध देना चाहिए, जिससे सभी मोह और शोक समाप्त हो जाते हैं और केवल भक्ति का मार्ग बचता है. ऐसा करने से सच्ची भक्ति होने लगेगी.  जब सुख होता है तो लगता है भगवान की कृपा है जब दुख हुआ तो लगता है यह कौन-सी बात है.

लेकिन भगवान सुख और दुख दोनों रूप में कृपा ही देते हैं, क्योंकि हमारे किसी पाप कर्म का फल की दुख है, भगवान  मंगल भवन सुख सिंधु है वह किसी को दुख नहीं देते. हमारे कर्म पीछे जो दुख वाले हुए हैं वो भोगेगा कौन, हमी को भोगना पड़ेगा है, “अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्, शुभ और अशुभ कर्म अवश्य भोगने पड़ेंगे, तो शुभ का फल का सुख और अशुभ का फल है दुख, चाहते हो सुख और करते हो पाप, तो दुख भोगना पड़ेगा, जो कानून है, वो कानून है उसे कोई काट नहीं सकता है. कानून के अंतगृत ही सारी क्रियाएं होगी, हमको अगर कोई भी दुख मिल रहा है तो भागवतिक कानून के अनुसार हम अपराधी थे इसीलिए हमे दुख मिल रहा है. कोई भी सुख मिल रहा है तो भागवतिक कानून के अनुसार हमने कुछ अच्छा किया है इसलिए हमे सुख मिल रहा है. भगवान सब पर कृपा करते हैं वह मंगल भवन हैं, महासुख देते हैं. 

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Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. Inkhabar इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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