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Maa Siddhidatri : नवमी के दिन मां के इस स्वरूप की आराधना से मिलती हैं भक्तों को सिद्धियां, शिव जी ने भी की पूजा

Navratri Siddhidatri: जानिए नवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा का महत्व, उनके स्वरूप, आठ प्रकार की सिद्धियां और भगवान शिव के साथ पौराणिक कनेक्शन.

By: Pandit Shashishekhar Tripathi | Published: September 20, 2025 5:44:16 PM IST



शारदीय हों या चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ प्रतिपदा वाले दिन मां शैलपुत्री के रूप में पूजन करके होता है। रोज मां दुर्गा के विभिन्न रूपों में किसी एक स्वरूप का पूजन किया जाता है और आठ स्वरूपों का पूजन करने के बाद नौवें तथा नवरात्र के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री का पूजन किया जाता है। मां दुर्गा का सिद्धिदात्री स्वरूप अंतिम और सबसे शक्तिशाली है क्योंकि यह सिद्धियों को देने वाला है।  

कितनी होती हैं सिद्धियां

मार्कण्डेय पुराण में महर्षि मार्कण्डेय ने और हनुमान चालीसा में गोस्वामी तुलसीदास ने आठ प्रकार की सिद्धियां बतायी हैं जो अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व हैं। दृढ़ संकल्प, साधना और कठिन तप के बाद ही इन सिद्धियों की प्राप्ति होती है जिनकी अधिष्ठात्री माता सिद्धिदात्री हैं और वही इन्हें प्रदान करती हैं। माता जानकी ने प्रसन्न होकर हनुमान जी को आठ सिद्धियां दी ही नहीं बल्कि उन्हें भी इन्हीं दूसरों को देने के लिए सक्षम बनाया इसलिए उनका नाम सिद्धिदाता भी पड़ा। माना जाता है कि सिद्धियां पाने के बाद उनका उपयोग परोपकार और लोक कल्याण में ही करना चाहिए। मां सिद्धिदात्री के नवम स्वरूप की आराधना से मनुष्य इन सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है। सिद्धियों को पाने के बाद भक्त के मन में कोई कामना नहीं रह जाती है और सुखों का भोग करते हुए मोक्ष प्राप्त करता है।   

मां का स्वरूप और नाम का अर्थ

चार भुजाओं वाली मां सिद्धिदात्री लाल साड़ी पहने हुए कमल के पुष्प पर विराजमान हैं। मां का वाहन सिंह है जबकि हाथों में कमल का फूल, शंख, गदा और सुदर्शन चक्र है। मान्यता है कि जो भक्त पूरे विधि विधान से मां सिद्धिदात्री की आराधना करते हैं उन्हें सभी प्रकार की सिद्धियां सहजता से प्राप्त हो जाती हैं और फिर उस व्यक्ति के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं रहता।

इस कारण शिव जी ने मां की आराधना की

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने मां सिद्धिदात्री की तपस्या कर उनसे सिद्धियां प्राप्त की थीं। उनकी कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ और वे अर्धनारीश्वर कहे जाने लगे। ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि का सृजन शुरू किया तो उन्होंने महसूस किया कि उनकी रचनाएं अपना समय पूरा होने के बाद नष्ट हो जाएंगी और फिर नए सिरे से सृजन करना होगा। बस इसी बात को लेकर वे शिव जी के पास पहुंचे और घोर तप कर उन्हें प्रसन्न किया। शिव जी उनकी समस्या के समाधान के लिए अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट हुए और उन्हें प्रजनन शील प्राणी तैयार करने की प्रेरणा दी। उन्होंने स्त्री और पुरुष का महत्व भी बताया। उनके शरीर का नर भाग शिव और नारी वाला भाग शिवा यानी शक्ति कहलाया और दोनो ही भाग एक दूसरे के पूरक हैं।

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