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Makar Sankranti 2026: आखिर भीष्म पितामह ने मृत्यु के लिए मकर संक्रांति का क्यों किया था इंतजार,मोक्ष से क्या है नाता?

Makar Sankranti 2026: क्या आप जानते हैं कि मकर संक्रांति को मृत्यु का सही समय क्यों माना जाता है. इसका भीष्म और मोक्श से नाता क्या है और उन्होंने ये ही दिन मौक के लिए क्यों चुना. आइए जानते हैं सबकुछ विस्तार में-

By: sanskritij jaipuria | Published: January 14, 2026 4:24:51 PM IST



Makar Sankranti 2026: आज जहां देश भर में मकर संक्रांति मनाई जा रही है, वहीं लोगों के मन में एक सवाल घूम रहा है कि आखिर भीष्म पितामह ने मृत्यु के लिए इंतजार क्यों किया तो आइए जानते हैं. बात है उस समय की जब महाभारत का युद्ध खत्म हो चुका था. चारों ओर शांति थी, लेकिन कुरुक्षेत्र की भूमि पर एक महान योद्धा अभी भी जीवन और मृत्यु के बीच अटका हुआ था. ये योद्धा कोई और नहीं भीष्म पितामह थे. अर्जुन के तीखे बाणों से घायल होकर वे बाणों की शय्या(बेड) पर लेटे थे. असहनीय पीड़ा के बावजूद उन्होंने तुरंत प्राण नहीं छोड़े. उन्होंने मृत्यु के लिए एक विशेष समय का इंतजार किया, जिसे उत्तरायण कहा जाता है. इसके पीछे गहरा धार्मिक कारण था.

 सूर्य का उत्तरायण क्या होता है

भारतीय शास्त्रों में वर्ष को दो भागों में बांटा गया है उत्तरायण और दक्षिणायन. जब सूर्य मकर संक्रांति के दिन मकर राशि में प्रवेश करता है, तब उत्तरायण की शुरुआत मानी जाती है. ये समय देवताओं का दिन कहा गया है, जबकि दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि माना जाता है.

धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति उत्तरायण में शरीर त्यागता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. माना जाता है कि ऐसी आत्मा को दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता और वो सीधे परम धाम को प्राप्त होती है.

भीष्म पितामह की इच्छा मृत्यु

भीष्म पितामह आजीवन ब्रह्मचारी रहे और उन्होंने कठोर व्रतों का पालन किया. उनके पिता राजा शांतनु ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया था. इसका मतलब ये था कि वे अपनी मृत्यु का समय स्वयं चुन सकते थे.

जब अर्जुन के बाणों से वे युद्धभूमि में गिरे, उस समय सूर्य दक्षिणायन में था. भीष्म जानते थे कि इस काल में देह त्याग करने पर आत्मा को फिर से जन्म के बंधन में पड़ना पड़ सकता है. इसलिए उन्होंने अपने प्राणों को रोके रखा और उत्तरायण की प्रतीक्षा की.

 पीड़ा से ऊपर उठा हुआ योगबल

बाणों के शय्या(बेड) पर पड़े रहना किसी भी सामान्य मनुष्य के लिए असंभव है. लेकिन भीष्म पितामह ने योग और साधना के बल पर अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया था. उन्होंने मन को शरीर की पीड़ा से ऊपर उठा दिया.

इसी समय उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म, जीवन के कर्तव्य और विष्णु सहस्रनाम का उपदेश दिया. वे चाहते थे कि उनका अंतिम समय पूर्ण चेतना, ज्ञान और शांति के साथ आए.

 मकर संक्रांति और मृत्यु का मतलब

अक्सर लोगों के मन में ये डर होता है कि यदि किसी पर्व या शुभ दिन पर मृत्यु हो जाए तो इसका क्या अर्थ होता है. शास्त्रों के अनुसार, मकर संक्रांति या उत्तरायण के समय देह त्याग करने वाली आत्मा को उत्तम गति प्राप्त होती है. इसे भय का नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का समय माना गया है.

भीष्म पितामह की कथा इसी विश्वास को मजबूत करती है कि सही समय पर, सही भाव के साथ किया गया देह त्याग मोक्ष का मार्ग बन सकता है.

महाराजा सगर के पुत्रों की कथा

धार्मिक मान्यता ये भी है कि मकर संक्रांति के दिन ही गंगा माता ने महाराजा सगर के 60,000 पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया था. उनके उद्धार के साथ ही ये विश्वास और गहरा हो गया कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं. इसी कारण मकर संक्रांति को केवल एक पर्व ही नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और मुक्ति का विशेष अवसर माना जाता है.

 

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