Four Ashrams of Life: सनातन धर्म में मनुष्य जीवन का चार भागों में बांटा गया है. हिंदू धर्म में इन 4 आश्रम को प्रमुख माना गया है. मनुष्य जीवन को 4 भागों में बांटा गया है जिसकी शुरुआत ब्रह्मचर्य से शुरू होती है, उसके बाद गृहस्थ आश्रम, फिर वानप्रस्थ, और आखिर में संयास आश्रम होता है.
सनातन धर्म में जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया है, जो व्यक्ति के आध्यात्मिक और सामाजिक उत्थान के लिए बहुत जरूरी मानें गए हैं. इसमें हर आश्रम या हर पड़ाव का अपना अलग और विशेष महत्व है.
सनातन धर्म के चार आश्रम-
ब्रह्मचर्य आश्रम
ब्रह्मचर्य आश्राम किसी के भी शुरुआत जीवन के शुरु के 25 वर्ष होते हैं, जिसमें बच्चा शिक्षा ग्रहण करता है और यह चरण आत्म-संयम का है. इस दौरान ज्ञान का विकास होता है, आपके चरित्र का निर्माण होता है और आपके शारीरिक और मानसिक विकास पर ध्यान दिया जाता है. साथ ही इस दौरान आप अन्य प्रकार की शिक्षाएं ग्रहण करते हैं. भविष्य के जीवन की नींव रखना और अनुशासन सीखना आपका लक्ष्य होता है.
गृहस्थ आश्रम
गृहस्थ आश्रम 25 साल से 50 साल का समय होता है. इस दौरान शादी, बच्चे, समाज पर ध्यान दिया जाता है. यह समय विवाह के बाद का होता है, जिसमें परिवार, समाज और धर्म के प्रति जिम्मेदारियों को निभाया जाता है. इस दौरान हर मनुष्य यह सीखता है कि धन को कैसे कमाएं एपनी गृहस्थी को कैसे चलाएं. और धर्म का पालन करते हुए समाज में अपना मान कैसे बनाएं.
वानप्रस्थ आश्रम
यह तीसरा चरण है. वानप्रस्थ में मनुष्य 50 साल के बाद प्रवेश करता है और यह 75 वर्ष तक रहता है. इस दौरान सांसारिक मोह से विरक्त होकर, परिवार से दूरी बनाकर ईश्वर भक्ति और समाज सेवा में मन को लगाता है. इस दौरान भगवान की भक्ति आपके लिए सर्वोपरि होती है. साथ ही परोपकार आपके जीवन का लक्ष्य होता है. इस दौरान आप वासनाओं को कम करना और ईश्वर से जुड़ना आपका लक्ष्य होता है.
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संन्यास आश्रम
सन्यास आश्रम जीवन का अंतिम चरण है. जीवन के आखिरी 25 साल इस चरण में आते हैं. यह समय 75 साल से मृत्यु तक का समय होता है. इस दौरान सांसारिक जीवन का पूर्ण त्याग करके मोक्ष के लिए आत्म-ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करना होता है. आत्मा को परमात्मा से मिलाने का लक्ष्य और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाना इस आश्रम का प्रमुख लक्ष्य है.
हिंदू धर्म में इन चारों आश्रम का विशेष महत्व बताया गया है. यह व्यवस्था व्यक्ति के आध्यात्मिक और भौतिक विकास के बीच संतुलन सुनिश्चित करती है. जीवन के हर पड़ाव को समझने के लिए व्यक्ति को 25 साल दिए जाते हैं. जिन्हे सनातक धर्म में चार आश्रमों में वर्णित किया गया है.
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