देश में बढ़ते आवारा कुत्तों और जानवरों के आतंक पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यह एक बेहद गंभीर समस्या है, आवारा जानवरों की वजह से मासूम बच्चों और बुजुर्गों की जान जा रही है. कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले में पशु प्रेमियों और पीड़ितों, दोनों पक्षों की दलीलों को अच्छे से सुनेंगे.
जजों के साथ हुए जानवरों वाले हादसों का जिक्र
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जमीनी हकीकत बयां करते हुए बताया कि पिछले 20 दिनों में राजस्थान में दो जज आवारा जानवरों के कारण दुर्घटना के शिकार हुए हैं. इनमें से एक जज को रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई और वे अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुए हैं. जस्टिस विक्रम नाथ ने याचिकाकर्ताओं से उनकी सटीक शिकायतें बताने को कहा और स्वीकार किया कि कुत्तों के काटने से होने वाली मौतें एक बड़ी चुनौती बन गई हैं. सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कोर्ट में दो टकराते हितों का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि एक तरफ पशु प्रेमी हैं और दूसरी तरफ वे लोग जो इन हमलों से प्रभावित हो रहे हैं. तुषार मेहता ने एक महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा कि रिहायशी इलाकों या गेटेड सोसायटियों में आवारा कुत्तों के भाग्य का फैसला वहां के समुदाय को ही करना चाहिए. उन्होंने तर्क दिया कि यदि किसी सोसायटी के अधिकांश निवासी बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए कुत्तों को खतरा मानते हैं, तो बहुमत से लिया गया फैसला लागू होना चाहिए.
“सभी कुत्ते आदमखोर नहीं होते”
वहीं, डॉग लवर्स की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कुत्तों के साथ हो रहे “अमानवीय” व्यवहार का मुद्दा उठाया। उन्होंने बाघ का उदाहरण देते हुए कहा, “जैसे एक बाघ के आदमखोर होने से जंगल के सभी बाघों को नहीं मारा जा सकता, वैसे ही कुछ घटनाओं के आधार पर सभी कुत्तों को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।” उन्होंने आवारा पशुओं के प्रति क्रूरता पर चिंता जताई।
अदालती आदेश और राज्यों की लापरवाही
कोर्ट ने 7 नवंबर के अपने पुराने आदेश को दोहराया, जिसमें स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक संस्थानों से आवारा कुत्तों को तुरंत हटाने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पकड़े गए कुत्तों को दोबारा उसी स्थान पर नहीं छोड़ा जाएगा.