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Harish Rana euthanasia case: हरीश राणा केस के बाद शुरू हुई पैसिव यूथेनेशिया पर बहस, जानिए किन देशों में है इच्छामृत्यु से जुड़े नियम

Harish Rana euthanasia case: हरीश राणा केस ने भारत में इच्छामृत्यु को लेकर नई बहस शुरू कर दी है. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में पैसिव यूथेनेशिया को सीमित शर्तों के साथ कानूनी मान्यता दी थी, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया अभी भी भारत में गैर-कानूनी है.

By: Ranjana Sharma | Published: March 12, 2026 6:30:38 PM IST



Harish Rana euthanasia case: गाजियाबाद के हरीश राणा केस ने देश में इच्छामृत्यु यानी यूथेनेशिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है. 13 साल से बिस्तर पर पड़े हरीश की हालत बेहद गंभीर बताई जा रही है और लंबे समय से इलाज के बावजूद सुधार की उम्मीद बहुत कम है. ऐसे में उनकी मां ने ही अदालत से बेटे के लिए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मांगी है. इस मामले के सामने आने के बाद यह सवाल फिर चर्चा में है कि भारत में इच्छामृत्यु को लेकर क्या कानून है और दुनिया के किन देशों में इसे कानूनी मान्यता मिली हुई है.

इच्छामृत्यु क्या होती है

इच्छामृत्यु या यूथेनेशिया का मतलब ऐसी स्थिति से है जब किसी गंभीर और लाइलाज बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को उसकी पीड़ा खत्म करने के लिए मृत्यु की अनुमति दी जाती है. आमतौर पर यह तब चर्चा में आता है जब मरीज लंबे समय से कोमा या वेजिटेटिव स्टेट में हो और उसके ठीक होने की संभावना बहुत कम या हो ही न इसमें इच्छामृत्यु दो तरीके से दी जाती है यूथेनेशिया मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है…

पैसिव यूथेनेशिया

इसमें मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट सिस्टम जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयों को बंद कर दिया जाता है, ताकि बीमारी के कारण उसकी प्राकृतिक मृत्यु हो सके. डॉक्टर कोई नया कदम नहीं उठाते बल्कि सिर्फ इलाज रोक देते हैं. भारत में कुछ शर्तों के साथ इसे कानूनी मान्यता मिली हुई है.

एक्टिव यूथेनेशिया

इसमें मरीज को मौत देने के लिए डॉक्टर दवा या इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं. भारत में यह पूरी तरह गैर-कानूनी है. यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी मरीज को दवा देकर मारता है, तो इसे हत्या या आत्महत्या में मदद के तौर पर माना जा सकता है और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है.

भारत में पैसिव यूथेनेशिया को मान्यता 

भारत में पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता 9 मार्च 2018 को मिली थी. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि गंभीर रूप से बीमार मरीज को “सम्मान के साथ मृत्यु का अधिकार मिल सकता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर कोई मरीज लाइलाज बीमारी से पीड़ित है या वेजिटेटिव स्टेट में सिर्फ लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे जिंदा है, तो उसकी इच्छा के अनुसार इलाज बंद किया जा सकता है. अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा बताया.

‘लिविंग विल’ क्या है

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ‘लिविंग विल’ की व्यवस्था को भी मान्यता दी. इसका मतलब है कि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हुए पहले से लिखित दस्तावेज में यह तय कर सकता है कि अगर भविष्य में वह लाइलाज बीमारी या कोमा की स्थिति में पहुंच जाए तो उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटा दिया जाए. इसके लिए कुछ शर्तें तय की गई हैं. लिविंग विल 18 वर्ष से अधिक उम्र का व्यक्ति ही लिख सकता है. इस दस्तावेज पर दो गवाहों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं और इसे न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित किया जाता है. इसके बाद अस्पताल का मेडिकल बोर्ड और जिला स्तर का एक स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड इसकी जांच करता है.

जब लिविंग विल न हो तो क्या होता है

अगर मरीज ने पहले से लिविंग विल नहीं बनाई है, तब उसका परिवार या करीबी इस संबंध में फैसला लेने की मांग कर सकते हैं. हालांकि इसके लिए सख्त प्रक्रिया अपनानी होती है. सबसे पहले अस्पताल के डॉक्टरों का एक मेडिकल बोर्ड मरीज की स्थिति की जांच करता है. इसके बाद जिला प्रशासन की ओर से विशेषज्ञ डॉक्टरों का दूसरा मेडिकल बोर्ड बनाया जाता है. दोनों बोर्ड की सहमति के बाद मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाता है, जो अंतिम निर्णय लेते हैं.

अरुणा शानबाग केस बना था बड़ा मोड़

भारत में इच्छामृत्यु पर सबसे बड़ी चर्चा 2011 में अरुणा शानबाग केस के दौरान हुई थी. मुंबई के केईएम अस्पताल की नर्स अरुणा शानबाग 1973 में एक हमले के बाद कोमा में चली गई थीं. लगभग चार दशक तक बिस्तर पर रहने के बाद उनके लिए इच्छामृत्यु की मांग की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने उस समय उनकी लाइफ सपोर्ट मशीनें हटाने की अनुमति नहीं दी, लेकिन इसी मामले में पहली बार पैसिव यूथेनेशिया को सीमित रूप में स्वीकार किया गया. यही फैसला बाद में 2018 के ऐतिहासिक निर्णय का आधार बना.

किन देशों में इच्छामृत्यु को अनुमति

दुनिया के कई देशों में एक्टिव यूथेनेशिया या असिस्टेड सुसाइड को कानूनी मान्यता दी गई है. इसमें  स्विट्जरलैंड दुनिया के पहले देशों में शामिल है, जहां 1942 में इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी गई. वहीं नीदरलैंड और बेल्जियम ने 2002 में कानून बनाकर इसे वैध किया. कनाडा ने 2016 में ‘मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग’ कानून लागू किया और  स्पेन ने 2021 में इच्छामृत्यु को वैध बनाया. लक्जमबर्ग, कोलंबिया, ऑस्ट्रिया और इक्वाडोर जैसे देशों में भी इसे अलग-अलग नियमों के तहत अनुमति मिली हुई है. वहीं अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में यह कानून पूरे देश में एक जैसा नहीं है. अमेरिका के कुछ राज्यों और ऑस्ट्रेलिया के कुछ राज्यों में ही इसकी अनुमति है.

क्यों चर्चा में है हरीश राणा केस

हरीश राणा पिछले 13 साल से बिस्तर पर हैं और उनकी हालत बेहद गंभीर बताई जा रही है. लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहने के कारण उनके शरीर पर गहरे बेडसोर्स भी बन चुके हैं. इस मामले में उनकी मां ने अदालत से पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मांगी है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली के एम्स में मेडिकल बोर्ड उनकी हालत की जांच कर रहा है. माना जा रहा है कि यह ऐसा पहला मामला है जिसमें 2018 में बनाए गए नियमों को पूरी तरह लागू किया जा रहा है.

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