मुंबई के बीएमसी चुनाव 2026 के नतीजे देखकर लगता है कि ये सिर्फ हार जीत की बात नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है. शिवसेना जो करीब तीस साल से बीएमसी पर राज कर रही थी खासकर उद्धव गुट, उसके लिए ये समय सोचने का है. बालासाहेब ठाकरे के एकछत्र राज से लेकर आज के बंटे हुए जनादेश तक शिवसेना का दबदबा क्यों कम हुआ, इसके पांच मुख्य कारणों पर थोड़ा देखते हैं.
शिवसेना का विभाजन
पहले तो शिवसेना का वो विभाजन जो जून 2022 में हुआ, वो सबसे बड़ी वजह लगती है. एकनाथ शिंदे के साथ पार्टी दो हिस्सों में बंट गई. कार्यकर्ता बंटे, और असली शिवसेना कौन है ये भी कन्फ्यूजन हो गया. मुंबई की लोकल शाखाओं पर बालासाहेब के जमाने की पकड़ अब दो गुटों में बंटी हुई है और इससे बीजेपी को फायदा मिला.
बीजेपी की आक्रामक ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ रणनीति
बीजेपी ने मुंबई में अपनी रणनीति बहुत स्मार्ट तरीके से चलाई. मराठी बनाम गैर मराठी का पुराना समीकरण तोड़ दिया, और विकास व मोदी ब्रांड पर फोकस किया. देवेंद्र फडणवीस की पकड़ और वार्ड स्तर पर उम्मीदवार चुनना, शिवसेना के इमोशनल कार्ड को हरा दिया. वो इलाके जो कभी शिवसेना के किले थे, वहां भी सेंध लग गई.
हिंदुत्व की परिभाषा का बदलना
हिंदुत्व की बात करें तो बालासाहेब के समय ये बहुत साफ और तेज था. लेकिन महाविकास अघाड़ी के साथ जाने के बाद उद्धव की शिवसेना का हिंदुत्व थोड़ा सॉफ्ट हो गया. बीजेपी और शिंदे गुट ने खुद को बालासाहेब के असली वारिस बताया, जिससे पुराने कट्टर वोटर कन्फ्यूज हो गए. शायद ये बदलाव पार्टी को महंगा पड़ा.
राज ठाकरे और उद्धव का ‘देर से हुआ’ गठबंधन
राज ठाकरे और उद्धव का गठबंधन भी देर से हुआ. कुछ वार्डों में समझ दिखी, लेकिन राजनीतिक लोग कहते हैं कि ये बहुत लेट था. राज का मराठी मानुस मुद्दा और उद्धव का हिंदुत्व, वोटरों को पूरी तरह जोड़ नहीं पाया, क्योंकि वो अलग रास्तों के आदी हो चुके थे.
‘लाडली बहन’ जैसे मुद्दे
पिछले तीन चार सालों से बीएमसी में कोई चुना हुआ प्रतिनिधि नहीं था, सब प्रशासक के हाथ में. सड़क और बुनियादी सुविधाओं पर जनता नाराज थी, उद्धव गुट को ये झेलना पड़ा. उधर शिंदे फडणवीस सरकार की लाडली बहन जैसी स्कीम्स ने महिलाओं के वोट में सेंध लगा दी. ये मुद्दे भी असर डाल गए.
उद्धव के लिए ये चुनाव अस्तित्व की लड़ाई था. कुछ गढ़ तो बचाए, लेकिन बीएमसी की चाबी हाथ से निकल गई. अब सिर्फ ठाकरे सरनेम से मुंबई पर राज करना मुश्किल लगता है. ये सब देखकर लगता है कि राजनीति में चीजें तेजी से बदल रही हैं.