Bee Corridor Scheme: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की ‘मधुमक्खी गलियारे’ योजना देश में हरित अवसंरचना को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम पहल मानी जा रही है. इस योजना के तहत राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे मधुमक्खी पालन और परागण-अनुकूल पौधों का रोपण किया जाएगा, ताकि सड़क नेटवर्क को जैव विविधता संरक्षण और ग्रामीण आय बढ़ाने से जोड़ा जा सके.
क्या है ‘मधुमक्खी गलियारे’ योजना?
इस पहल का उद्देश्य हाईवे किनारे ऐसे हरित पट्टे विकसित करना है, जहां मधुमक्खियों के लिए उपयुक्त फूलदार और स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाए जाएं. इन क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देकर शहद उत्पादन और परागण गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाएगा.
यह कैसे काम करेगी?
- राजमार्गों के किनारे खाली या हरित क्षेत्र की पहचान की जाएगी.
- वहां पर स्थानीय जलवायु के अनुसार फूलदार और परागण-समर्थ पौधे लगाए जाएंगे.
- स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों और स्थानीय किसानों को मधुमक्खी पालन से जोड़ा जाएगा.
- प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता के जरिए शहद उत्पादन को बाजार से जोड़ा जाएगा.
जैव विविधता को कैसे मिलेगा बढ़ावा?
मधुमक्खियां प्राकृतिक परागण का अहम हिस्सा हैं. इनके माध्यम से फसलों और वनस्पतियों की उत्पादकता बढ़ती है. हाईवे किनारे हरित पट्टियों में विविध पौधों के रोपण से तितलियों, पक्षियों और अन्य कीटों के लिए भी अनुकूल वातावरण बनेगा, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होगा.
किसानों की आय में कैसे होगी बढ़ोतरी?
मधुमक्खी पालन कम लागत और कम भूमि में शुरू किया जा सकता है. शहद, मोम और अन्य उत्पादों की बिक्री से किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा. साथ ही बेहतर परागण से आसपास की फसलों की पैदावार में भी वृद्धि हो सकती है.
जलवायु स्थिरता और हरित मॉडल
हाईवे किनारे बड़े पैमाने पर पौधारोपण कार्बन अवशोषण में मदद करेगा. इससे तापमान नियंत्रण, धूल कम करने और पर्यावरण संरक्षण में योगदान मिलेगा. यह मॉडल देश में सतत विकास और हरित अवसंरचना का नया उदाहरण बन सकता है, जहां सड़क निर्माण सिर्फ यातायात तक सीमित न रहकर पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को मजबूती देगा.
‘मधुमक्खी गलियारे’ जैसी पहलें भारत में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती हैं.