Sickle cell disease: सिकल सेल रोग एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जिसमें लाल रक्त कोशिकाएं सामान्य गोल आकार की बजाय हंसिया (सिकल) के आकार की हो जाती हैं. इन असामान्य कोशिकाओं के कारण शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह बाधित होता है. यह बीमारी जन्म से होती है और जीवनभर रहती है. इसमें शरीर असामान्य हीमोग्लोबिन बनाता है, जिसे हीमोग्लोबिन एस कहा जाता है. यही असामान्य हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं को सख्त और चिपचिपा बना देता है, जिससे वे छोटी रक्त वाहिकाओं में फंस सकती हैं और दर्द व अंगों को नुकसान पहुंचा सकती हैं.
सिकल सेल रोग के कारण
यह बीमारी एचबीबी जीन में बदलाव के कारण होती है. यह पूरी तरह से आनुवंशिक है और माता-पिता से बच्चों में विरासत में मिलती है. यदि माता-पिता दोनों में सिकल सेल जीन मौजूद है, तो बच्चे को यह रोग होने की संभावना बढ़ जाती है. अगर केवल एक माता या पिता में यह जीन है, तो बच्चा सिकल सेल ट्रेट का वाहक हो सकता है, लेकिन उसे गंभीर लक्षण नहीं होते.
प्रमुख लक्षण
सिकल सेल रोग के लक्षण अक्सर बचपन में ही दिखाई देने लगते हैं. मरीज को बार-बार तेज दर्द के दौरे पड़ सकते हैं, जिसे पेन क्राइसिस कहा जाता है. खून की कमी यानी एनीमिया, हाथ-पैरों में सूजन, बार-बार संक्रमण, थकान और कमजोरी इसके आम लक्षण हैं. बच्चों में शारीरिक विकास में देरी भी देखी जा सकती है. गंभीर मामलों में स्ट्रोक या शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है.
आनुवंशिक जोखिम
यदि दोनों माता-पिता सिकल सेल ट्रेट के वाहक हैं, तो बच्चे को 25 प्रतिशत संभावना पूरी बीमारी होने की, 50 प्रतिशत संभावना वाहक बनने की और 25 प्रतिशत संभावना सामान्य होने की रहती है. भारत के कुछ राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड और ओडिशा में यह बीमारी अधिक पाई जाती है, खासकर कुछ आदिवासी समुदायों में.
स्क्रीनिंग क्यों जरूरी
नवजात शिशुओं की जन्म के तुरंत बाद जांच करने से बीमारी की जल्दी पहचान हो सकती है. विवाह से पहले या गर्भावस्था के दौरान जांच से भी यह पता लगाया जा सकता है कि बच्चे को बीमारी होने का जोखिम कितना है. समय पर जांच से इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है और संक्रमण व अन्य जटिलताओं से बचाव संभव है.
समय पर इलाज जरूरी
यदि सिकल सेल रोग की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए, तो मरीज को नियमित दवाएं, टीकाकरण और चिकित्सकीय निगरानी के जरिए बेहतर जीवन दिया जा सकता है. समय पर इलाज से दर्द के दौरे कम किए जा सकते हैं और स्ट्रोक जैसी गंभीर जटिलताओं से बचाव किया जा सकता है.