बाबा आदम के जमाने में जी रहा भारत, नई होने के बाद भी 90’s जैसी क्यों है देश की ट्रेनें?

Trains In India Look Dented: ट्रेन को सबसे पसंदीदा और आसान साधन मानते हैं. पिछले कुछ सालों में भारतीय रेलवे सिस्टम में कई तरह की सुधार किए गए हैं. लेकिन इसके बावजूद नई भारतीय ट्रेन पूरानी लगती है.

Published by Preeti Rajput

Trains In India Look Dented: भारतीय रेलवे हमारे देश में लाइफलाइन की तरह काम करती है. यह कम कीमत और समय पर भारी भरकम सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में मदद करती है. यही कारण है कि लोग ट्रेन को सबसे पसंदीदा और आसान साधन मानते हैं. पिछले कुछ सालों में भारतीय रेलवे सिस्टम में कई तरह की सुधार किए गए हैं. हालांकि एक चीज है जिसके कारण हमें दूसरे देशों में चलने वाली ट्रेनों की तुलना में आज कर महसूस होती हैं. यह चीज है. कोच की फिनिशिंग या लुक है. हमारे पास कई रूट पर नई वंदे भारत कोच हैं, लेकिन फिर भी इंटरनेशनल ट्रेनों की तुलना में वह कमतर नजर आती हैं. एकदम नई कोच भी, जो फैक्ट्री से निकलती हैं, उसमें भी डेंट नजर आते हैं.

भारतीय ट्रेनों के कोच

हाल ही में एक वीडियो आकाश भावसार के पावर ट्रेन नाम के YouTube चैनल पोस्ट किया गया है. इस वीडियो में व्लॉगर भारतीय ट्रेनों के कोच की तुलना दूसरे देशों की ट्रेनों के कोच से कर रहे हैं. वह बताते हैं कि यूरोपियन देशों में चलने वाली ट्रेनों के कोच काफी लग्जरी नजर आते हैं. जबकि हमारे यहां नई ट्रेन के पैनल पर भी डेंट नजर आते हैं. 

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कोच का निर्माण

इस कमी का कारण इन कोच को बनाने का तरीका है. भारत में कोच बनाने वाली फैक्ट्रियां पुराने तरीकों और एल्युमिनियम पैनल के कई छोटे-छोटे टुकड़ों का इस्तेमाल करके बनाई जाती है. यह शीट जरूरी मोटाई की होती हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में छोटी-छोटी शीट के टुकड़ों को कोच के लिए वेल्ड करके बाहरी खोल बनाया जाता है.

दूसरे देशों में ट्रेन के कोच बनाने के लिए 

दूसरे देशों में ट्रेन के कोच बनाने के लिए एल्युमिनियम शीट को मनचाहा आकार देने के लिए बड़ी हाई प्रेशर प्रेस का इस्तेमाल किया जाता है. इस तरह, उन्हें एक जैसी फिनिश मिलती है जो छोटी शीट से नहीं मिल सकती. कई कोच फैक्ट्रियों में वेल्डिंग का काम भी रोबोट करते हैं, लेकिन भारत में यह काम मैनुअल लेबर करते हैं. इससे भी काम की फिनिश पर असर पड़ता है. दातर भारतीय ट्रेनों में इस्तेमाल होने वाले कोच लैडर-ऑन-फ्रेम कंस्ट्रक्शन के होते हैं. कई यूरोपीय देशों में ऐसा नहीं है. उनमें मोनोकॉक कंस्ट्रक्शन होता है जो यात्रियों को बेहतर अनुभव देता है.

स्मूद और चमकदार फिनिश

पेंट भी एक और फैक्टर है जो इंटरनेशनल ट्रेनों को स्मूद और चमकदार फिनिश देता है. पैनल पेंट करने के मामले में वे अक्सर कई कार ब्रांड्स जैसा ही तरीका अपनाते हैं. हालांकि, भारत में ऐसा नहीं है. हम अभी भी PU पेंट इस्तेमाल कर रहे हैं और हम ऊपर से ग्लॉस या क्लियर कोट भी नहीं लगाते. मेटल पैनल पर बिना फिलर के सीधे पेंट करने से उभार और वेल्डिंग के निशान दिखते रहते हैं और कोच को असमान या डेंट वाला लुक मिलता है.

क्यों नहीं हो रही मशीनरी अपग्रेड

इंडियन रेलवे अपनी मशीनरी को अपग्रेड नहीं कर रहा है. क्योंकि इसमें काफी ज्यादा खर्च लगता है. ये मशीनें सस्ती नहीं आतीं और अगर इन्हें लगाया गया, तो इसका असर किराए पर भी पड़ सकता है. सरकार ने इस ऑप्शन पर विचार किया था और उन्हें पता चला कि इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का नया कोच बनाने में मौजूदा कोच से करीब 30-40 करोड़ रुपये ज्यादालगेंगे.

Preeti Rajput
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