शादी, तलाक…’हक’ के लिए लड़ी औरत, क्या है शाह बानो और राम मंदिर का कनेक्शन? जिसपर बनी Haq

यामी गौतम और इमरान हाशमी की अपकमिंग फिल्म एक एतिहासिक केस पर बेस्ड है. इस फिल्म में 40 साल पुराना मामला और उस महिला की कहानी देखने को मिलेगी जिसका राम जन्मभूमि के ताला खुलने से कनेक्शन है.

Published by Prachi Tandon

Who is Shah Bano Haq Movie: बॉलीवुड एक्ट्रेस यामी गौतम (Yami Gautam) एक बार फिर दमदार कहानी और अदाकारी के साथ स्क्रीन पर लौट रही हैं. यामी गौतम की अपकमिंग फिल्म देश के ऐतिहासिक मामले और एक ऐसी औरत पर बेस्ड है जिसने हक की लड़ाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. इतना ही नहीं, उस औरत का राम मंदिर जन्मभूमि का ताला खुलने से भी कनेक्शन रहा है. जी हां, हम यहां बात कर रहे हैं शाह बानो के बारे में. 

1985 में शाह बानो (Shah Bano Case) बनाम मोहम्मद अहमद खान मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. यह फैसला ऐतिहासिक होने के साथ-साथ विवादास्पद भी रहा है. क्योंकि, इस फैसले में एक महिला का हक ही नहीं, बल्कि यूनिफॉर्म सिविल कोड, वक्फ बोर्ड, ट्रिपल तलाक जैसे कई मुद्दे जुड़े थे. अब इसी ऐतिहासिक मामले की कहानी यामी गौतम (Yami Gautam New Movie) और इमरान हाशमी (Emraan Hashmi) की फिल्म (Haq Movie) में देखने को मिलने वाली है. 

कौन थीं शाह बानो?

मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वालीं शाहबानो (Shah Bano Story) एक मुस्लिम महिला थीं. 1978 में शाहबानो के वकील पति मोहम्मद अहमद खान ने उन्हें तलाक दे दिया था. तब शाहबानो की उम्र 43 साल और वह पांच बच्चों की मां थी. तलाक के बाद उनपर न तो उनके पास कमाई का साधन था और न ही पति ने गुजारा भत्ते देने की जिम्मेदारी ली. तब शाहबानो ने अपने हक के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था. 

शाहबानो ने CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग की थी. यह धारा हर देश के नागरिक पर लागू होती है और इसमें कोई धर्म आड़े नहीं आता. इस धारा के तहत कोई भी व्यक्ति अपने बच्चों, पत्नी और माता-पिता को बेसहारा नहीं छोड़ सकता है. 

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हालांकि, शाह बानो के पति खुद वकील थे तो उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत इद्दत की अवधि यानी लगभग 3 महीने ही वह भरण-पोषण देगा. इस मामले पर फैमिली कोर्ट ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया था. लेकिन, इसे शाह बानो के पति ने चैलेंज किया और मामला सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा. 7 साल की लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया था. इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों की जीत माना गया था. 

शाहबानो केस पर सरकार का बड़ा कदम

शाहबानो के पक्ष में फैसला आने पर पूरे देश में अलग-अलग धार्मिक संगठनों ने विरोध छेड़ दिया था. जिसके दबाव में आकर सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित कर दिया. इस अधिनियम के तहत पति सिर्फ इद्दत की अवधि तक गुजारा भत्ता देगा और इसके बाद जिम्मेदारी महिला के रिश्तेदारों या वक्फ बोर्ड की होगी. यह कानून पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने वाला था, जिसकी आलोचना आज तक होती है. लेकिन, शाहबानो की हिम्मत और मामले ने कानून और राजनीति में बहस छेड़ दी थी. 

क्या है शाहबानो और राम मंदिर का कनेक्शन?

शाहबानो मामले पर फैसले और धार्मिक संगठनों के दबाव में आकर सरकार ने कानून तो लागू कर दिया. लेकिन, इसकी वजह से तत्कालीन राजीव गांधी सरकार की जनता के बीच इमेज बन गई कि वह मुस्लिम परस्त है. ऐसे में अपनी छवि को तोड़ने के लिए राजीव गांधी ने राम मंदिर जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाया था.

Prachi Tandon

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