Shepherd’s Son Reaches AIIMS Deoghar: यह कहानी संघर्ष, अटूट संकल्प और उन सपनों की है जो गरीबी की बेड़ियों को तोड़कर अपने सपनों को उड़ान देने का हौसला रखते हैं. दरअसल, यह कहानी है एक ऐसे युवक की है जिसने चरवाहे का बेटा होने के बावजूद भी कभी हार नहीं मानी और अपनी कड़ी मेहनत के दम पर देश के प्रतिष्ठित संस्थान AIIMS (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान), देवघर में अपनी अनोखी जगह बनाई.
संघर्षों से भरा था पूरा बचपन
एक छोटे से गांव में जन्मे इस छात्र का बचपन संघर्षों से भार हुआ बीता. दरअसल, छात्र के पिता एक साधारण चरवाहे थे, जिनका जीवन पशुओं को चराने और उनके माध्यम से होने वाली मामूली आय पर ही पूरी तरह से निर्भर था. तो वहीं, दूसरी तरफ समाज में ज्यादातर ऐसे बच्चों के भविष्य पर सवाल उठाए जाते हैं और यहां तक कि, यह भी माना जाता है कि वे सिर्फ और सिर्फ अपने पुश्तैनी काम तक ही सीमित रह पाएंगे, लेकिन इस छात्र की आँखों में कुछ और ही सपने थे, जिससे वह बचपन से पूरी करना चाहता था.
पढ़ाई और मुश्किलों का सामना
संसाधनों की कमी ऐसी थी कि कभी बिजली नहीं होती थी, तो कभी किताबों के लिए पैसे नहीं होते थे. इतना ही नहीं, दिन भर पिता के काम में हाथ बंटाना और रात को तेल के दीये की रोशनी में घंटों तक पढ़ाई करना उसकी दिनचर्या बन गई थी. इसके अलावा, शिक्षकों ने उसकी प्रतिभा को पहचाना और उसे लगातार प्रोत्साहित किया. इतना ही नहीं, बिना किसी महंगे कोचिंग सेंटर के उसने सिर्फ किताबों के सहारे NEET जैसी कठिन परीक्षा की तैयारी करने की शुरुआत की.
नीट का परिणाम घोषित, गांव में खुशी
जैसे ही NEET का परिणाम घोषित हुआ, तो पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गई. चरवाहे के बेटे ने न सिर्फ परीक्षा को पास किया, बल्कि अपनी रैंक के दम पर AIIMS देवघर में एमबीबीएस (MBBS) की सीट हासिल कर हर किसी को पूरी तरह से हैरान कर दिया. यह सफलता केवल एक छात्र की नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की हार है जो मानते हैं कि सफलता केवल सुविधाओं की मोहताज होती है. आज हर छात्रों को इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए जो अपने सपनों को उड़ान देने का मजबूत हौसला रखते हैं.