Bihar Election: बिहार चुनाव में किसकी तरफ भूमिहार समाज? सवर्णों में सबसे ज्यादा हैं गरीब, क्या होंगे इनके मुद्दे

Bihar Chunav 2025: बिहार में अगर भूमिहार समाज की आर्थिक स्थिति की बात करें तो 2023 के जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चला कि करीब 28 प्रतिशत भूमिहार परिवार गरीब हैं.

Published by Hasnain Alam

Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के बाद तमाम राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियों को तेज कर दिया है. साथ ही सभी पार्टियां चुनाव में बाजी मारने के लिए सीटों के गुणा-भाग में लगी हुई हैं. ऐसे में उनकी ओर से एक-एक सीट पर वहां के समीकरण को ध्यान में रखकर चुनावी मैदान में मुकाबले का प्लान तैयार किया जा रहा है.

बिहार में जब भी चुनाव की बात होती है, तो जातीय समीकरण की भी खूब चर्चा होती है और सभी पार्टियां इसका खास ध्यान रखती हैं. साथ ही उन जातियों का साधने का प्रयास करती है. बिहार में एक ऐसी ही जाति है, जिनका राज्य की राजनीति में काफी अहम योगदान माना जाता है. हम बात कर रहे हैं भूमिहार वोटबैंक की.

50-60 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका में भूमिहार

भूमिहार वोटबैंक, जो बिहार की लगभग 50-60 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है. यह माना जाता है कि भूमिहार समुदाय NDA खासकर BJP के साथ है. इसकी वजह यह भी है कि बड़ी संख्या में लोग लालू यादव को सवर्ण विरोधी बताते आए हैं और ‘भूरा बाल साफ करो’ के नारे को उनसे जोड़ते हैं.

दरअसल ‘भूरा बाल साफ करो’ में भू का आशय भूमिहार, रा का आशय राजपूत, बा का आशय ब्राह्मण और ला का आशय का लाला (कायस्थ) से है. इस नारे का इस्तेमाल 1990 के दशक में लालू यादव को सवर्ण विरोधी बताने के लिए किया गया था.

वहीं लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल इस नारे से अपना कोई संबंध होने से लगातार इनकार करती रही है. राजद का कहना है कि पार्टी के संस्थापक लालू प्रसाद ने इस तरह का नारा कभी नहीं दिया. 

भूमिहार समाज से हैं विजय कुमार सिन्हा

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ऐसे में जब भी चुनाव आता है. इस नारे की चर्चा जरूर होती है और NDA इसका लाभ उठाने की कोशिश करती है. बिहार के डिप्टी CM विजय कुमार सिन्हा और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह इसी कम्युनिटी से हैं.

इससे पहले बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (श्री बाबू) भूमिहार कम्युनिटी से ही थे. 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के साथ ही बिहार की राजनीति बदल गई और भूमिहारों की सत्ता में भागीदारी कम हो गई. बीते लोकसभा चुनाव में भूमिहार समाज से तीन सांसद चुने गए थे.

वहीं अगर बात करें भूमिहार समाज की आर्थिक स्थिति की तो 2023 के जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चला कि करीब 28 प्रतिशत भूमिहार परिवार गरीब हैं. ये सवर्णों (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ) में सबसे ज्यादा है. इन आंकड़ों ने भूमिहारों के हमेशा से बनी संपन्न समाज होने की छवि तोड़ दी.

EWS में सबसे ज्यादा भूमिहार परिवार

  • जाति-        परिवार-        EWS
  • भूमिहार- 8,38,447- 2,31,211 (27.58 फीसदी)
  • ब्राह्मण- 10,76,563- 2,72,576 (25.32 फीसदी)
  • राजपूत- 9,53,848- 2,37,412 (24.89 फीसदी)
  • कायस्थ- 1,60,331- 22,174 (13.83 फीसदी)

बता दें कि EWS यानी इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन सामान्य श्रेणी के उन लोगों के लिए है, जिनकी सालाना आय 8 लाख रुपये से कम होती है.

भूमिहारों को BJP का कोर वोटर माना जाता है. हालांकि, तेजस्वी यादव पिता की राजनीति से अलग भूमिहारों को अपनी ओर खींच रहे हैं. JDU ललन सिंह और कांग्रेस अखिलेश प्रसाद सिंह के जरिए इस समुदाय पर पकड़ बनाए रखना चाहते हैं.

ऐसे में अब देखना होगा कि चुनाव में भूमिहार समाज के वोट को कौन गठबंधन अपनी तरफ कितना खींचने में कामयाब होती है. फिलहाल, भूमिहार समुदाय दोराहे पर है. उनके पास भी रोजगार, शिक्षा और विकास जैसे मुद्दे हैं, जिसपर ध्यान रहेगा. 

Hasnain Alam

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