Iran US Conflict Impact India: अमेरिका द्वारा ईरान से जुड़े समुद्री व्यापार पर लगाए गए प्रतिबंध का असर भारत पर केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कई आर्थिक क्षेत्रों पर इसका दबाव देखने को मिल सकता है. ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें पहले ही 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर हैं, यह स्थिति भारत के लिए और चुनौतीपूर्ण बन सकती है.
ऊर्जा आपूर्ति और बढ़ती लागत की चिंता
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव से एलएनजी और एलपीजी की सप्लाई बाधित होने का खतरा है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर काफी हद तक निर्भर है. ऐसे में सप्लाई में कमी और शिपिंग लागत में वृद्धि से देश की ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ सकता है. इसके साथ ही रुपये पर दबाव और घरेलू ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना भी बढ़ जाती है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भरता
भारत के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, क्योंकि देश का लगभग आधा कच्चा तेल इसी रास्ते से आयात होता है. क्षेत्र में तनाव बढ़ने से फ्रेट और इंश्योरेंस लागत में वृद्धि होती है, साथ ही डिलीवरी में देरी भी हो सकती है. इसका सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ने की आशंका है.
एलपीजी और घरेलू बजट पर असर
भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का लगभग 60% आयात करता है, जिसमें से करीब 90% सप्लाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए आती है. ऐसे में किसी भी प्रकार की बाधा घरेलू रसोई तक असर डाल सकती है. एलपीजी सिलेंडर महंगे हो सकते हैं और सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है, जिससे आम लोगों के खर्च में इजाफा होगा.
कई सेक्टरों पर पड़ने वाला दबाव
इस संकट का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा. ट्रांसपोर्ट, कृषि, उर्वरक, केमिकल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भी इसका असर पड़ सकता है. इसके साथ ही FMCG उत्पादों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है. कुल मिलाकर, यह दबाव बाजार के जरिए आम लोगों के घरेलू बजट तक पहुंचेगा और महंगाई बढ़ा सकता है.