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Sabarimala Case Update: संप्रदाय का मसला, अदालत का दखल नहीं हो सकता…सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से क्या दलील दी गई?

Sabarimala case update: केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने दलील दी कि हर मंदिर और संप्रदाय की अपनी अलग परंपराएं होती हैं, जिन्हें कानूनी या संवैधानिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए.

By: Shubahm Srivastava | Published: April 9, 2026 5:48:46 PM IST



Supreme Court Hearing Sabarimala Case: सबरीमाला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश पर रोक को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को भी सुनवाई जारी रही. यह मामला लंबे समय से आस्था बनाम अधिकार की बहस का केंद्र बना हुआ है. सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने एक बार फिर मंदिर की परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए अपनी दलील पेश की. अदालत में यह मुद्दा इस बात पर केंद्रित रहा कि क्या धार्मिक परंपराओं को संवैधानिक अधिकारों के दायरे में परखा जाना चाहिए या नहीं.

केंद्र सरकार का पक्ष- परंपरा सर्वोपरि

केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने दलील दी कि हर मंदिर और संप्रदाय की अपनी अलग परंपराएं होती हैं, जिन्हें कानूनी या संवैधानिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई मंदिरों में केवल शाकाहारी भोजन की अनुमति होती है और वहां मांसाहार ले जाना प्रतिबंधित है. यदि कोई व्यक्ति इसे अपना अधिकार बताकर नियम तोड़ने की कोशिश करे, तो यह मंदिर की परंपरा और आस्था का उल्लंघन होगा.

धार्मिक मान्यताओं के उदाहरण से समझाया पक्ष

एएसजी नटराज ने आगे कहा कि कुछ मंदिरों में शराब को प्रसाद के रूप में भी स्वीकार किया जाता है, जो अलग-अलग परंपराओं का उदाहरण है. ऐसे मामलों में लोग सवाल उठा सकते हैं, लेकिन हर संप्रदाय की अपनी मान्यताएं होती हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी बाहरी संस्था, खासकर अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन सी परंपरा सही है या गलत. यह पूरी तरह संबंधित समुदाय और उसकी आस्था का विषय है.

अदालत की टिप्पणी- टकराव में दखल जरूरी

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि जब दो पक्षों के बीच टकराव होता है, तो अदालत का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है. उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि एक समूह किसी परंपरा का समर्थन करता है और दूसरा उसे चुनौती देता है, तो न्यायिक समीक्षा आवश्यक हो जाती है. यहां तक कि उसी संप्रदाय के भीतर भी कोई व्यक्ति किसी प्रथा को गलत ठहराकर अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है, जिससे न्यायिक हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है.

सुनवाई के दौरान दी गई अन्य दलीलें 

इस मामले में तुषार मेहता ने भी दलील दी कि कई मंदिरों में पुरुषों के प्रवेश पर भी रोक होती है, जिसे भेदभाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि परंपरा के रूप में समझा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि हर धार्मिक स्थल की अपनी विशिष्टता होती है और उसे उसी संदर्भ में देखना जरूरी है. कुल मिलाकर, सुनवाई में यह स्पष्ट हुआ कि मामला केवल महिला अधिकारों का नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन का है.

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