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Kinnar wedding mystery: किन्नरों की ‘एक रात की शादी’ का क्या है रहस्य… अगले दिन करते हैं विधवाओं सा विलाप

Kinnar wedding mystery: किन्नरों की “एक रात की शादी” कोई रहस्यमयी रस्म भर नहीं, बल्कि महाभारत की कथा और गहरी आस्था से जुड़ी परंपरा है, जिसे आज भी कूवगम जैसे उत्सवों में निभाया जाता है.

By: Ranjana Sharma | Published: March 18, 2026 3:53:23 PM IST



Kinnar wedding mystery: किन्नर समुदाय से जुड़ी कई परंपराएं आज भी लोगों के लिए रहस्य बनी हुई हैं. इन्हीं में से एक है “एक रात की शादी” की परंपरा, जिसे अक्सर जिज्ञासा और आश्चर्य के नजरिए से देखा जाता है. लेकिन यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और पहचान से जुड़ी गहरी परंपरा है.

आध्यात्मिक दर्जा और समाज में विशेष स्थान

हिंदू मान्यताओं में किन्नरों को सिर्फ सामाजिक समूह नहीं माना गया, बल्कि उन्हें दिव्य शक्तियों से जुड़ा हुआ माना जाता है. कई परंपराओं में उन्हें भगवान का स्वरूप, आशीर्वाद देने वाला और अर्धनारीश्वर की छवि का प्रतीक भी समझा जाता है. यही वजह है कि इनके रीति-रिवाज भी सामान्य समाज से अलग और खास होते हैं.

‘एक रात की शादी’ खास परंपरा

यह मान्यता हर किन्नर समुदाय में नहीं पाई जाती. यह एक विशेष परंपरा है, जो मुख्य रूप से दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु के कुछ इलाकों में देखने को मिलती है. यहां इस रस्म को बड़े उत्सव और श्रद्धा के साथ निभाया जाता है.

महाभारत की कथा से जुड़ा है रिश्ता

इस परंपरा की जड़ें महाभारत काल की एक कथा से जुड़ी मानी जाती हैं. किन्नर समुदाय के आराध्य माने जाने वाले अरावन, अर्जुन और नागकन्या उलूपी के पुत्र थे. युद्ध से पहले देवी को प्रसन्न करने के लिए उनके बलिदान की आवश्यकता पड़ी. अरावन ने बलिदान के लिए सहमति दी, लेकिन एक शर्त रखी—वह बिना विवाह किए बलि नहीं देंगे. समस्या यह थी कि कोई भी स्त्री अगले ही दिन विधवा बनने को तैयार नहीं थी. तब भगवान श्रीकृष्ण ने मोहिनी रूप धारण कर अरावन से विवाह किया. अगले दिन अरावन ने बलिदान दिया और श्रीकृष्ण ने विधवा की तरह शोक मनाया. यही घटना इस परंपरा की आधारशिला मानी जाती है.

कूवगम उत्सव में जीवित होती है यह परंपरा

तमिलनाडु के कूवगम उत्सव में आज भी इस परंपरा को जीवित रखा गया है. यहां किन्नर एक दिन के लिए अरावन से प्रतीकात्मक विवाह करते हैं. शादी के बाद अगले दिन वे विधवाओं की तरह शोक मनाते हैं—सिंदूर मिटाते हैं, चूड़ियां तोड़ते हैं और विलाप करते हैं. यह परंपरा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि किन्नर समुदाय की पहचान, उनकी भावनाओं और एकजुटता का प्रतीक भी है. समाज से अलग-थलग रहने के बावजूद, यह परंपरा उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर रखती है.

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