दुनिया में एक ऐसा अनोखा देश भी है, जहां ऊर्जा का मेन स्रोत जमीन के नीचे छिपी प्राकृतिक गर्मी है. यहां धरती के भीतर से निकलने वाली गर्म भाप और पानी लोगों की जरूरतें पूरी करते हैं. यही वजह है कि ये देश धीरे-धीरे पेट्रोल और डीजल पर अपनी निर्भरता कम करता जा रहा है और उसकी जगह साफ-सुथरी ऊर्जा के ऑप्शन अपनाए जा रहे हैं.
ये देश उन चुनिंदा जगहों में शामिल है, जहां बिना तेल के भी जीवन काफी हद तक सामान्य रूप से चल सकता है. भले ही पूरी तरह तेल का इस्तेमाल बंद नहीं हुआ है, लेकिन ऊर्जा व्यवस्था इतनी ज्यादा ग्रीन एनर्जी पर बेस्ड हो चुकी है कि तेल की जरूरत बहुत कम रह गई है.
प्रकृति से मिलने वाली ऊर्जा
आइसलैंड एक ऐसा देश है, जहां ज्वालामुखीय गतिविधियां बहुत ज्यादा हैं. इसी कारण यहां जमीन के नीचे से निकलने वाली गर्मी का उपयोग बिजली बनाने, घर गर्म रखने और कई घरेलू कामों में किया जाता है. इसके अलावा यहां बहने वाली ग्लेशियर नदियों से बड़े पैमाने पर हाइड्रोपावर भी तैयार होती है, जिससे लगभग पूरी बिजली ग्रीन मानी जाती है.
घरों तक पहुंचती प्राकृतिक गर्मी
यहां गर्म पानी पाइपों के जरिए सीधे घरों तक पहुंचाया जाता है, जिससे हीटिंग के लिए तेल की जरूरत लगभग खत्म हो जाती है. बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा जलविद्युत और बाकी जियोथर्मल एनर्जी से आता है, इसलिए कोयला या तेल का उपयोग बहुत कम होता है.
इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ते कदम
ये देश अब परिवहन के क्षेत्र में भी बदलाव कर रहा है. पेट्रोल पंप धीरे-धीरे कम किए जा रहे हैं और उनकी जगह इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन तेजी से बढ़ रहे हैं. सड़कों के किनारे नियमित दूरी पर चार्जिंग की सुविधा उपलब्ध है, जिससे लंबी यात्रा भी आसान हो जाती हैय
खेती और लाइफस्टाइल पर असर
यहां सस्ती और भरपूर जियोथर्मल ऊर्जा के कारण ग्रीनहाउस में पूरे साल फल और सब्जियां उगाई जाती हैं, चाहे बाहर कितना भी ठंडा मौसम क्यों न हो. इससे खेती पर तेल की कमी का ज्यादा असर नहीं पड़ता.
कुल मिलाकर, ये देश ग्रीन एनर्जी का एक बेहतरीन उदाहरण बन चुका है. यहां की बिजली, हीटिंग और कई दैनिक जरूरतें पहले से ही नवीकरणीय स्रोतों से पूरी हो रही हैं. इसलिए अगर भविष्य में तेल की कमी भी हो जाए, तो भी यहां की ऊर्जा व्यवस्था काफी हद तक स्थिर रह सकती है.