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Masaan Holi Varanasi: मणिकर्णिका पर मसाने की होली… महादेव ने श्मशान को क्यों बनाया अपना घर, भस्म को अपना रंग

Masaan Holi Varanasi: काशी के मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली मसान होली एक अनोखी और प्राचीन परंपरा है, जिसमें रंगों की जगह चिता की भस्म से होली खेली जाती है. यह उत्सव धुलंडी से कुछ दिन पहले रंगभरी एकादशी के बाद मनाया जाता है.

By: Ranjana Sharma | Last Updated: February 28, 2026 6:36:17 PM IST



Masaan Holi Varanasi: होली का पर्व रंग, उल्लास और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है. देशभर में लोग अबीर-गुलाल से एक-दूसरे को रंगते हैं, लेकिन काशी में एक ऐसी होली खेली जाती है, जो दुनिया भर में अनोखी मानी जाती है. यहां रंगों की जगह चिता की भस्म उड़ाई जाती है. इसे ‘मसान होली’ कहा जाता है, जो सदियों पुरानी परंपरा है और आस्था, अध्यात्म तथा वैराग्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है.

धुलंडी से पहले शुरू होता है उत्सव

साल 2026 में 4 मार्च को धुलंडी खेली जाएगी, लेकिन काशी में उससे तीन दिन पहले मणिकर्णिका घाट पर मसान होली का आयोजन होगा. रंगभरी एकादशी के अगले दिन यह परंपरा निभाई जाती है. वर्ष 2026 में आमलकी (रंगभरी) एकादशी 27 फरवरी को है और 28 फरवरी को मसान होली खेली जाएगी. श्मशान का नाम सुनते ही जहां मन में भय का भाव आता है, वहीं बाबा विश्वनाथ की नगरी में यही स्थान उत्सव का केंद्र बन जाता है.

क्यों महादेव ने चुना श्मशान को अपना धाम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने स्वयं इस परंपरा की शुरुआत की थी. कथा है कि विवाह के बाद जब शिव पहली बार काशी आए, तब देवताओं ने रंगोत्सव मनाया. उस अवसर पर भूत-प्रेत, यक्ष और गण इस उत्सव से वंचित रह गए. अपने सभी भक्तों का ख्याल रखने वाले भोलेनाथ ने फाल्गुन शुक्ल द्वादशी के दिन मणिकर्णिका घाट पर अपने गणों के साथ भस्म की होली खेली. तभी से यह परंपरा चली आ रही है. शिव के लिए श्मशान वैराग्य और सत्य का प्रतीक है. वे मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग मानते हैं.

काशी का आध्यात्मिक संदेश

काशी में मृत्यु को मोक्ष का द्वार कहा जाता है. इसलिए मसान होली जीवन और मृत्यु के द्वंद्व को मिटाने का पर्व है. यहां यह संदेश दिया जाता है कि जीवन का वास्तविक रंग मोह-माया से परे है. भोलेनाथ की दृष्टि में कुछ भी अपवित्र नहीं. वे गृहस्थ की जल अर्पण से भी प्रसन्न होते हैं और श्मशान की राख में भी आनंदित रहते हैं. भस्म से होली खेलना यह दर्शाता है कि मृत्यु एक नई शुरुआत है.

डमरू की गूंज और भस्म का रंग

मणिकर्णिका घाट पर नागा साधु, अघोरी और अन्य साधु-संत एकत्र होते हैं. बाबा महाश्मशान नाथ और माता मसान काली की आरती के बाद जलती चिताओं के बीच भस्म की होली शुरू होती है. गले में नरमुंड धारण किए साधु शिव की भक्ति में लीन होकर डमरू की धुन पर नृत्य करते हैं. जब राख हवा में उड़ती है, तो दृश्य अलौकिक हो उठता है.

परंपरा और मर्यादा

मसान की होली मुख्य रूप से साधु-संत ही खेलते हैं. समय के साथ कुछ शिवभक्त भी इसमें शामिल होने लगे हैं, हालांकि अधिकतर लोग दूर से इस अद्भुत दृश्य का दर्शन करते हैं. परंपरागत रूप से महिलाओं की भागीदारी इस उत्सव में नहीं होती.

आस्था, वैराग्य और अद्भुत अनुभव

काशी की मसान होली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन-मृत्यु के दर्शन को समझने का अवसर है. यहां रंगों की जगह भस्म है, लेकिन भावनाओं में वही उल्लास है. यह अनूठी परंपरा दुनिया को संदेश देती है कि जहां अंत दिखता है, वहीं से एक नई शुरुआत भी होती है.

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