What is Alimony: भरण-पोषण, जिसे अंग्रेजी में एलिमनी या स्पाउस मेंटेनेंस कहा जाता है, वो आर्थिक सहायता है जो अदालत के आदेश से एक जीवनसाथी दूसरे को अलगाव या तलाक के बाद देता है. इसका उद्देश्य ये है कि जो साथी आर्थिक रूप से कमजोर है, वो सम्मानजनक जीवन जी सके और उसे रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष न करना पड़े. ये सहायता किसी एक लिंग तक सीमित नहीं है. आम तौर पर आर्थिक रूप से निर्भर व्यक्ति को ये अधिकार मिलता है, चाहे वो पत्नी हो या पति.
कौन मांग सकता है भरण-पोषण?
पत्नी- अधिकतर मामलों में पत्नी भरण-पोषण की मांग करती है, खासकर यदि वो गृहिणी रही हो या उसकी आय पति से कम हो. अदालत ये देखती है कि विवाह के दौरान वो किस जीवन लेवल पर रह रही थी और अब उसकी जरूरतें क्या हैं.
कामकाजी महिलाएं- यदि पत्नी नौकरी करती है, तब भी वो भरण-पोषण मांग सकती है, बशर्ते उसकी आय इतनी न हो कि वो विवाह के दौरान मिले जीवन लेवल को बनाए रख सके.
पति- कानून के अनुसार पति भी भरण-पोषण मांग सकता है. यदि वो बेरोजगार है, शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ है और पत्नी की आय पर निर्भर है, तो उसे भी सहायता मिल सकती है.
अदालत किन बातों पर विचार करती है?
आय और संपत्ति- दोनों पक्षों की कुल आय, संपत्ति और कमाने की क्षमता देखी जाती है.
विवाह के दौरान जीवन लेवल- विवाह के समय परिवार किस तरह का जीवन जी रहा था, ये भी जरूरी होता है.
विवाह का समय- लंबे समय तक चले विवाह में अक्सर ज्यादा या लंबे समय के लिए भरण-पोषण दिया जाता है.
उम्र और स्वास्थ्य- दोनों पक्षों की उम्र और शारीरिक व मानसिक स्थिति भी निर्णय को प्रभावित करती है.
वैवाहिक आचरण- यदि किसी पक्ष ने गलत व्यवहार किया हो, जैसे क्रूरता, तो इसका असर निर्णय पर पड़ सकता है.
बच्चों की जिम्मेदारी- यदि बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी एक अभिभावक पर है, तो उसकी आर्थिक जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाता है.
आपसी सहमति- कई बार आपसी सहमति से तलाक होने पर दोनों पक्ष मिलकर राशि तय कर लेते हैं, जिसे अदालत मंजूरी देती है.
कब नहीं मिलता भरण-पोषण?
यदि मांग करने वाला व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्षम है और खुद अपना खर्च उठा सकता है.
यदि भरण-पोषण पाने वाला दोबारा विवाह कर ले.
यदि अदालत को लगे कि मांग करने वाले ने गंभीर वैवाहिक कदाचार किया है.
भारत में कानूनी प्रावधान
भारत में भरण-पोषण से जुड़े नियम अलग-अलग कानूनों में दिए गए हैं:
Hindu Marriage Act, 1955 की धारा 24 और 25 के तहत अंतरिम (मुकदमे के दौरान) और स्थायी भरण-पोषण का प्रावधान है.
Code of Criminal Procedure, 1973 की धारा 125 के तहत सभी धर्मों के लिए भरण-पोषण का अधिकार दिया गया है.
Special Marriage Act, 1954 में भी ऐसे प्रावधान मौजूद हैं.
इन कानूनों का उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि तलाक या अलगाव के बाद कोई भी जीवनसाथी आर्थिक रूप से असहाय न रहे. भरण-पोषण का मकसद किसी एक पक्ष को दंड देना नहीं, बल्कि आर्थिक संतुलन बनाए रखना है. अदालत हर मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर फैसला करती है ताकि दोनों पक्षों के अधिकार और जरूरतों का उचित सम्मान हो सके.