Intermittent Fasting: आंतरायिक उपवास आजकल वजन घटाने और मेटाबॉलिक हेल्थ सुधारने के लिए काफी लोकप्रिय है. लेकिन एक आम सवाल उठता है—क्या लंबे समय तक खाली पेट रहने से मस्तिष्क की क्षमता पर असर पड़ता है? क्या फास्टिंग से याददाश्त, ध्यान या सोचने-समझने की शक्ति कम हो सकती है?
दिमाग को ऊर्जा कैसे मिलती है?
हमारा मस्तिष्क मुख्य रूप से ग्लूकोज़ से ऊर्जा लेता है. जब हम नियमित रूप से भोजन करते हैं, तो शरीर कार्बोहाइड्रेट से ग्लूकोज़ बनाता है और वही दिमाग तक पहुंचता है. लेकिन उपवास की स्थिति में, जब शरीर को भोजन से ग्लूकोज़ नहीं मिलता, तो वह फैट को तोड़कर ‘कीटोन बॉडीज़’ बनाता है. शोध बताते हैं कि दिमाग कीटोन को भी प्रभावी ऊर्जा स्रोत के रूप में इस्तेमाल कर सकता है.
विज्ञान क्या कहता है?
कई अध्ययनों में पाया गया है कि नियंत्रित और संतुलित आंतरायिक उपवास से मस्तिष्क की कार्यक्षमता कम नहीं होती. कुछ रिसर्च में यह भी संकेत मिला है कि सीमित समय के उपवास से ब्रेन हेल्थ में सुधार हो सकता है. उपवास से ‘ब्रेन-डिराइव्ड न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर’ (BDNF) नामक प्रोटीन का स्तर बढ़ सकता है, जो न्यूरॉन्स की सेहत और नई कोशिकाओं के निर्माण में मदद करता है. कुछ पशु अध्ययनों में उपवास को न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के जोखिम को कम करने से भी जोड़ा गया है.
सावधानी भी है जरूरी
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि अधिक समय तक या असंतुलित तरीके से उपवास करने पर चक्कर आना, कमजोरी, ध्यान में कमी और चिड़चिड़ापन जैसे लक्षण दिख सकते हैं. खासकर अगर शरीर को पर्याप्त पानी, इलेक्ट्रोलाइट्स और पोषण न मिले तो अस्थायी रूप से मानसिक कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है.
किन लोगों को सावधान रहना चाहिए?
- मधुमेह के मरीज
- गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएं
- कम वजन वाले लोग
- किशोर और बुजुर्ग
- जिन लोगों को पहले से कोई न्यूरोलॉजिकल या गंभीर बीमारी है