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Premanand Ji Maharaj: प्रेमानंद जी महाराज से जानें जीवन में धैर्य और संतोष कैसे स्थापित करें

Premanand Ji Maharaj: प्रेमानंद जी महाराज के अनमोल वचन लोगों को उनके जीवन के प्रेरित करते हैं. नाम जप, भगवान की सेवा, माता-पिता की सेवा करना ही परम सेवा है. जानते हैं प्रेमानंद जी महाराज जीवन में धैर्य और संतोष कैसे स्थापित करें.

By: Tavishi Kalra | Published: January 22, 2026 8:05:03 AM IST



Premanand Ji Maharaj: प्रेमानंद जी महाराज, एक हिंदू तपस्वी और गुरु हैं, जो राधावल्लभ संप्रदाय को मानते हैं. प्रेमानंद जी महाराज अपनी भक्ति, सरल जीवन, और मधुर कथाओं के लिए लोगों में काफी प्रसिद्ध हैं. हर रोज लोग उनके कार्यक्रम में शामिल होते हैं जहां वह लोगों के सवालों के जवाब देते हैं.हजारों लोगों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते हैं. उनके प्रवचन, जो दिल को छू जाते हैं, ने उन्हें बच्चों और युवाओं सहित विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया है. प्रेमानंद जी महाराज नाम जप करने के लिए के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं और साफ मन से अपने काम को करें और सच्चा भाव रखें.

भक्त के सवाल पर प्रेमानंद जी महाराज ने बताया कि जीवन में धैर्य और संतोष कैसे स्थापित करें,

सबसे पहली बात है कि हम धैर्य कैसे लाएं, सबसे पहले जानते हैं कि धैर्य क्या है, आई हुई आपदा में घबरा ना जाना, पास में ज्ञानेंद्री की सुविधा होते हुए भी भोग ना करना, रसेंद्री के भोग होने पर भी हमारा रसेंद्री चलायमान ना हो. जनेंद्री और रसेंद्री को जो अपने बस में रखता है उसे धैर्यवान कहते हैं.

“कांच वाच मन निश्चल राखे, धनी धनी कोटि तेरी रे”

तो जो मन का पक्का हो वहीं धर्म के मार्ग पर चल पाता है. हमारी कोई निंदा करें, अपमान करें,हम विचलित ना हो यह तब होगा जब रसेंद्री और जनेंद्री को काबू में कर भगवान का भजन किया जाएगा.  भजन तभी पुष्ट होगा.

जो धर्म युक्त भोगों को भोगता है रेसंद्री और जनेंद्री को काबू में रखता है, वहीं धैर्यवान होता है. 

सारे जगत में मैं जो बंधन का कारण है. अगर साधु संग किया जाए और नमन भक्ति आ जाए तो मैं का नाश हो जाए. सबके प्रति नमन भाव, मैं नाश हो जाए, सबको भगवान का स्वरुप मानना इससे मैं खत्म हो जाएगा. जहां दृष्टि जाए वहां अपने भगवान को देखकर नमन करें अपने को सबसे नीच समझें. अपना कभी सम्मान स्वीकार ना करें दूसरों को सम्मान प्रदान करें तो अंहकार का नाश हो जाएगा.

दूसरों में दोष का दर्शन होना और अपने में गुण का दर्शन होना यह अंहकार बढ़ना का अंदेशा है. नमन भक्ति करें इससे अंहकार नष्ट होगा.

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Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. Inkhabar इसकी सत्यता का दावा नहीं करता 

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