जापान की अनोखी परंपरा, जहां बेटियों के दांत किए जाते हैं काले

एक समय था जब दांतों का काला (Black Teeth) होना बदसूरत नहीं, बल्कि सुंदरता और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक (Symbol of Social Status) माना जाता था. दक्षिण-पूर्व एशिया (SoutheastAsia) और भारत की कई जनजातियों में यह परंपरा विवाहयोग्यता (Marriageability) और परिपक्वता (Maturity) का संकेत थी. जापान में इसे “ओहागुरो” कहा जाता था, जबकि भारत में “मिस्सी” के नाम से जाना जाता था.

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The daughter becomes eligible for marriage, the parents blacken her teeth: वैसे तो इस दुनिया में बड़ी ही अनोखे तरह के संस्कृति है. लेकिन ऐसे कुछ देश हैं जहां विचित्र तरह के नियम आज भी निभाए जाते हैं. जापान में आज भी जब बेटियां शादी के लायक हो जाती हैं तो, उनके माता-पिता दांत काले कर देते हैं. तो आइए जानते हैं इस अनोखे परंपरा के बारे में. 

दांत काले करने की प्रथा, ओहागुरो से मिस्सी तक:

प्राचीन जापान, भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में दांत काले करने की परंपरा केवल सौंदर्य तक नहीं थी, बल्कि यह यौवन (Dating Age), परिपक्वता और सामाजिक स्थिति का एक बहुआयामी प्रतीक बन गया था. 

आखिर क्या है सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व:

इस अनोखे परंपरा को जापान में ‘ओहागुरो’ कहा जाता था. यह परंपरा ज्यादातर विवाहित महिलाओं, समुराई के लोगों के बीच बेहद ही प्रसद्धि थी. यह सौंदर्य और अपनी सामाजिक हैसियत दिखाने का एक अलग ही तरीका था. साल 1870 में, पश्चिमी सौंदर्य मानकों के प्रभाव में जापान की सरकार ने इसे आधिकारिक तौर पर पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया था. तो वहीं दूसरी तरफ हिल ट्राइब्स की महिलाएं इसे परंपरा और सौंदर्य के रूप में देखा करती थीं. 

दांत काले करने से होती है दांतों की सुरक्षा:

दंत संरक्षण (Dental Protection): इस्तेमाल किए जाने वाले मिश्रण, जैसे जापान का ‘कनेमिज़ु’ (लोहे की बुरादे को सिरके में घोलकर बना गाढ़ा काला घोल) और अन्य हर्बल तत्व (टैनिन), दांतों को पूरी तरह से सील करने का काम करते थे. आधुनिक शोधों के मुताबिक, यह प्रक्रिया दांतों को कीड़ा लगने से बचाने में पूरी तरह से मदद करते थे. इसके साथ ही यह दांतों को स्वस्थ के साथ-साथ सुरक्षित भी रहते थे.

कनेमिज़ु बनाने के लिए लोहे के तत्वों को सिरके में घोलकर गाढ़ा काला घोल बनाया जाता था, जिसमें अक्सर स्वाद सुधारने के लिए गालनट पाउडर, चाय की पत्तियां और मसाले (जैसे दालचीनी और लौंग) मिलाए जाते थे. 

यह प्रथा भले ही आधुनिक युग में लगभग विलुप्त हो गई हो, लेकिन इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अभी भी जिंदा है. यह दर्शाती है कि पश्चिमी प्रभाव से पहले, एशियाई संस्कृतियों में दांत काले करना सम्मान और संस्कृति का एक गौरवशाली हिस्सा था.

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