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इस देश की वजह से भारत-चीन के बीच शुरू हुई थी दुश्मन, 1962 में चीन के हमले के पीछे भी थी यही वजह! PM मोदी की यात्रा से आएगा क्या कोई बदलाव?

India China Relations: प्रधानमंत्री मोदी इस महीने के अंत में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन का दौरा करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा और भी खास होने वाला है क्योंकि साल 2020 में गलवान घाटी में चीनी सैनिकों की घुसपैठ के बाद दोनों देशों के रिश्ते बिगड़ गए थे।

Published by Shubahm Srivastava

India China Relations: प्रधानमंत्री मोदी इस महीने के अंत में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन का दौरा करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा और भी खास होने वाला है क्योंकि साल 2020 में गलवान घाटी में चीनी सैनिकों की घुसपैठ के बाद दोनों देशों के रिश्ते बिगड़ गए थे। प्रधानमंत्री मोदी ने आखिरी बार साल 2018 में चीन का दौरा किया था। सरकार जल्द ही इस दौरे को लेकर आधिकारिक घोषणा कर सकती है।

प्रधानमंत्री मोदी के चीन दौरे पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते काफी बदलते रहे हैं। चाहे वह सीमा विवाद हो या डोकलाम विवाद जब दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। आइए एक नजर डालते हैं कि भारत और चीन के बीच दुश्मनी कितनी पुरानी है और इसकी शुरुआत कैसे हुई?

तिब्बत को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव

दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा मुद्दा तिब्बत है। दरअसल, यह ब्रिटिश हुकूमत के जमाने का मामला है। वर्ष 1914 में तत्कालीन भारत सरकार (ब्रिटिश हुकूमत) और तिब्बत के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते पर ब्रिटिश प्रशासक सर हेनरी मैकमोहन और तिब्बत के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए थे।

इस समझौते के तहत, भारत के तवांग के साथ पूर्वोत्तर सीमांत क्षेत्र और बाहरी तिब्बत के बीच एक सीमा पर विचार किया गया था। ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1938 में एक नक्शा भी प्रकाशित किया था जिसमें इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच खींची गई रेखा को दर्शाया गया था। इस रेखा को मैकमोहन रेखा के नाम से जाना जाता है।

भारत ने तिब्बत को अलग देश के रूप में मान्यता दी

भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ और 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का गठन हुआ। तभी से, चीन ने ब्रिटिश सरकार और तिब्बत के बीच हुए शिमला समझौते को अस्वीकार करना शुरू कर दिया। चीन का कहना था कि तिब्बत पर उसका अधिकार है और वह वहाँ की सरकार और ब्रिटिश सरकार के बीच किसी भी समझौते को स्वीकार नहीं करेगा।

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चीन ने 1951 में तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया, जिसके बाद हालात बिगड़ते चले गए। चीन का दावा था कि वह तिब्बत को आज़ादी दे रहा है, जबकि भारत ने तिब्बत को एक अलग देश के रूप में मान्यता दी। फिर 1987 में भारत ने अरुणाचल प्रदेश को एक अलग राज्य का दर्जा दिया। इससे पहले, 1972 तक इसे नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी के नाम से जाना जाता था। 20 जनवरी 1972 को पहली बार इसे केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया और इसका नाम अरुणाचल प्रदेश रखा गया।

चीन ने भारतीय हिस्सों को दिखाया अपने नक्शे में

 1958 में चीन ने नया आधिकारिक नक्शा प्रकाशित किया। इस बार सारी हदें पार कर उसने आधिकारिक नक्शे में चीन ने भारत के पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र पर अपना हक जता दिया। हद तो तब हो गई जब चीन ने लद्दाख, उत्तर प्रदेश के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश को भी चीन ने अपना बताना शुरू कर दिया। 

इसके अलावा भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से मांग करने लगा कि यहां का सर्वे कराया जाए. हालांकि, 14 दिसबंर 1958 को पंडित नेहरू ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया।

1962 में चीन ने किया भारत पर हमला

1962 में चीन ने भारत पर हमला भी कर दिया था। यह 20 अक्टूबर 1962 का दिन था। चीन ने लद्दाख और मैकमोहन रेखा पर एक साथ हमला किया था। यह युद्ध 21 नवंबर तक चला और चीन ने खुद ही अपने पैर पीछे खींच लिए। तब से दोनों देशों के बीच लगातार तनाव बना हुआ है। सीमा पर दोनों पक्षों के सैनिकों के बीच झड़पें होती रहती हैं। हालाँकि, हाल के दिनों में इसमें कुछ कमी आई है।

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