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Basant Panchami: पीला रंग, सूफियाना संगीत और आस्था! 700 साल से दिल्ली की इस दरगाह पर मनाई जा रही बसंत पंचमी

Nizamuddin Dargah: जैसा की आप सभी जानते हैं कि बसंत पंचमी एक हिंदू त्योहार है जो ज्ञान, कला और संस्कृति की देवी सरस्वती को समर्पित है. वहीं इसे अगर दूसरे पहलु से देखा जाए तो इसे मौसम से भी जोड़ा जाता है.

Published by Heena Khan

Basant Panchami at Nizamuddin Dargah: जैसा की आप सभी जानते हैं कि बसंत पंचमी एक हिंदू त्योहार है जो ज्ञान, कला और संस्कृति की देवी सरस्वती को समर्पित है. वहीं इसे अगर दूसरे पहलु से देखा जाए तो इसे मौसम से भी जोड़ा जाता है. हमारे देश में, इस दिन को वसंत के आगमन का प्रतीक भी माना जाता है. आस-पास सब कुछ पीले रंग में रंगा हुआ लगता है. पीला रंग नई शुरुआत, शुभ शुरुआत और पॉजिटिव एनर्जी का प्रतीक है. वहीं दिल्ली में एक ऐसी जगह है जहां इस रंग की खूबसूरती और भी मनमोहक हो जाती है. यह जगह सूफी संत हजरत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह है, जहाँ पिछले 700 सालों से बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जा रहा है, और यह परंपरा आज भी जारी है. हाल ही में इस मशहूर दरगाह की कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. जिसमे देखा जा सकता है कि कैसे इस त्यौहार को मनाया जा रहा है. 

सूफी भी बनाते हैं वसंत पंचमी

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बसंत पंचमी वसंत के आगमन का प्रतीक है और हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व को दर्शाता है. यह ज्ञान, संगीत और कला की देवी सरस्वती को समर्पित दिन है. पारंपरिक रूप से, भक्त पीले कपड़े पहनते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं, और मौसम की ताजगी का जश्न मनाते हैं. हालांकि, निज़ामुद्दीन दरगाह में, यह त्योहार सूफी रहस्यवाद से भरा हुआ है.

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गुरु और शिष्य के बीच खास रिश्ता

यह परंपरा सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया के जीवन के एक मार्मिक पल से जुड़ी है. अपने भतीजे की मौत के दुख में वे गहरे शोक में डूब गए थे. उनके शिष्य, अमीर खुसरो, अपने गुरु का दर्द नहीं देख सके. बसंत पंचमी के दिन, उन्होंने कुछ हिंदुओं को संगीत के साथ और पीले कपड़े पहनकर त्योहार मनाते देखा. तभी उन्हें अपने गुरु का दुख कम करने का एक तरीका मिला. खुसरो भी बसंत के रंगों में सजे, गायकों और संगीतकारों के जुलूस के साथ औलिया के घर पहुंचे और उनके चरणों में पीले फूल चढ़ाए. इस दिल को छू लेने वाले भाव से निजामुद्दीन औलिया की आँखों में आँसू आ गए और उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई. यहीं से दरगाह में बसंत पंचमी की परंपरा की शुरुआत हुई.

एकता का संदेश

आज, बसंत पंचमी के दिन, हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पीले रंग की सजावट और फूलों से जीवंत हो उठती है. पूरा परिसर फूलों से सजा होता है, अमीर खुसरो के सूफी छंद और कव्वालियाँ चारों ओर गूंजती हैं, और भक्तों में मिठाइयाँ बांटी जाती हैं. यहाँ, बसंत पंचमी का उत्सव प्यार, भक्ति और एकता का संदेश देता है.

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