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क्या अलग-अलग धर्म के लड़का और लड़की रह सकते हैं लिव-इन में, क्या कहता है कि HC का ताजा फैसला?

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि उत्तर प्रदेश धर्मांतरण निषेध कानून न तो दूसरे धर्म में शादी पर रोक लगाता है और न ही ऐसे जोड़ों को लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहने पर एतराज जताता है.

By: JP Yadav | Published: February 24, 2026 5:05:28 PM IST



Allahabad High Court : भारत के संविधान के आर्टिकल 14, 15, और 21 और एक्ट 2021 मद्देनजर यह नहीं कहा जा सकता कि अलग धर्म वाले जोड़े का लिव-इन रिलेशनशिप अपराध है.  इसके साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर बड़ा और अहम फैसला सुनाया है. उत्तर प्रदेश प्रोहिबिशन ऑफ़ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ़ रिलिजन एक्ट, 2021 के तहत इंटरफेथ कपल्स का लिव-इन रिलेशनशिप कोई जुर्म नहीं है. कोर्ट ने आगे कहा कि एक्ट के तहत इंटरफेथ मैरिज भी बैन नहीं है. अगर पिटीशनर ने कोई अपराध नहीं किया है तो इस कोर्ट को कोई कारण नहीं दिखता कि सुरक्षा देने की उनकी अर्जी क्यों नहीं मानी जा सकती है.

सात मुस्लिम और पांच हिंदू महिलाओं की 12 पिटीशन में दूसरे कम्युनिटी के पुरुषों के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के लिए कथित तौर पर धमकियां मिलने के बाद पुलिस प्रोटेक्शन की मांग की गई थी. कोर्ट ने कहा कि हर नागरिक की ज़िंदगी और आज़ादी की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है. इंसान की ज़िंदगी के अधिकार को बहुत ऊंचा स्थान दिया जाना चाहिए, चाहे किसी नागरिक का धार्मिक विश्वास कुछ भी हो. जाति, पंथ, लिंग या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकते है. 

साथ में रह सकते हैं दो लोग

सात मुस्लिम और पांच हिंदू महिलाओं की 12 पिटीशन को एक साथ जोड़ते हुए अपनी टिप्पणी में कहा कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं तो अलग होने की स्थिति में महिला को भरण-पोषण का अधिकार मिलेगा. यह भी कहा कि यह अधिकार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत दिया जाएगा. इलाहाबाद कोर्ट के जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने कहा कि 2 लोग अपनी मर्जी से रह रहे हैं तो यह कोर्ट यह समझने में फेल है कि अगर कानून एक ही जेंडर के दो लोगों को शांति से साथ रहने की इजाजत देता है, तो न तो कोई व्यक्ति है. ऐसे में न ही कोई परिवार और न ही राज्य को दो बालिग लोगों के हेट्रोसेक्सुअल रिलेशनशिप पर एतराज़ हो सकता है. 

नियमों का नहीं किया उल्लंघन

उधर, राज्य सरकार की तरफ से एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल ने तर्क दिया कि धर्म बदलने के कानून के सेक्शन 3 की व्याख्या से पता चलता है कि धर्म बदलना सिर्फ शादी के लिए ही ज़रूरी नहीं है, बल्कि शादी जैसे सभी रिश्तों में भी ज़रूरी है. सरकार के वकील ने आगे कहा कि वर्ष 2021 का धर्म बदलने से जुड़ा कानून शादी या लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहने जैसे रिश्तों पर भी लागू होगा. किसी भी पिटीशनर ने एक्ट के सेक्शन 8 और 9 के नियमों के तहत धर्म बदलने के लिए अप्लाई नहीं किया है. ऐसे में पिटीशनर के रिश्ते को कानून के नियमों के उल्लंघन में सुरक्षित नहीं किया जा सकता है. शादी जैसे रिश्ते में पिटीशनर के रहने को कोर्ट से मंज़ूरी नहीं मिल सकती है.  इस पर कोर्ट ने कहा कि इन मामलों में यह नहीं कहा जा सकता है कि पिटीशनर ने एक्ट, 2021 के नियम का उल्लंघन करते हुए कोई  अपराध किया गया है. 

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