Roza Kholne Ki Dua: रमजान का पाक महीना 19 फरवरी से शुरू हो चुका है. वहीं मुसलमान इस महीने में शिद्द्त के साथ ३० रोज़े रखते हैं. ऐसे में वो सारा दिन कुछ खाते नहीं है. वहीं आपको बता दें कि इस्लामिक कैलेंडर का नौवां पवित्र महीना रमज़ान का होता है, खास बात ये है कि दुनिया भर के मुसलमानों के लिए ये एक बेहद खास महीना माना जाता है. ये एक ऐसा महीना होता है जिसमे हर एक शख्स अल्लाह की इबादत करता है और गरीबों का सहारा बनता है. रमज़ान के पूरे महीने में रोज़ा रखने और अच्छे काम करने से अल्लाह की रहमत मिलती है.
कब से शुरू हुए रमज़ान
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत में 18 फरवरी, 2026 की शाम को चांद दिखा, जिससे 19 फरवरी को रमज़ान का महीना शुरू हो गया. वहीं कल, गुरुवार को रोज़ा रखने वालों ने अपना पहला रोज़ा रखा. फज्र की नमाज़ से पहले सेहरी की गई और शाम को इफ्तार के साथ रोज़ा तोड़ा जाएगा. इस्लाम में रोज़ा रखना ज़रूरी माना जाता है. लेकिन, यह समय सिर्फ़ एक फ़र्ज़ पूरा करने का मामला नहीं है. रोज़े के दौरान, मुसलमान रोज़ा रखकर और प्यासे रहकर खुद को पवित्र करने और नेकी के रास्ते पर चलने की कसम खाते है.
रोज़ा रखने के नियम
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस्लाम में रोज़ा रखने और उसे खोलने से पहले नमाज़ पढ़ी जाती है. वहीं दिन में 5 बार नमाज़ पढ़ने का हुकुम है. खास बात ये है कि ये दुआएं न सिर्फ़ रोज़े की अहमियत बढ़ाती हैं बल्कि अल्लाह को खुश भी करती हैं. इसलिए, रोज़ा रखने वाले लोगों को पूरे महीने रोज़े से पहले और बाद में कुछ दुआएं पढ़ने का हुकुम है. चलिए जान लेते हैं रोज़ा रखने से पहले और इफ्तार करने से पहले कौन सी दुआ पढ़ी जाती है.
रोजा रखने से पहले की दुआ
‘व बिसौमि ग़दिन नवैतु मिन शह्रि रमज़ान’
इसका अर्थ: मैं अल्लाह के लिए रमज़ान के रोज़े की नीयत करता/करती हूं.
दुआ पढ़ना क्यों जरूरी
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रोज़ा सेहरी से शुरू होता है. लेकिन, सेहरी से पहले नीयत करना ज़रूरी है, क्योंकि यह पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुन्नत है. इसलिए, सेहरी से पहले रोज़े की नीयत या दुआ कर लें.
इफ्तार करने से पहले की दुआ
‘अल्लाहुम्मा इन्नी लका सुम्तु, व बिका आमन्तु, व अलैका तवक्कल्तु, व अला रिज़्किका अफ़्तरतु.’
इसका अर्थ : ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए रोज़ा रखा, तुझ पर ईमान लाया, तुझ पर भरोसा किया और तेरी दी हुई रोज़ी से रोज़ा खोला.
दुआ पढ़ना क्यों जरूरी
मगरिब की नमाज़ सूरज डूबने के समय होती है, इस दौरान रोज़ा रखने वाले लोग इफ़्तार की तैयारी करते हैं और अपना रोज़ा खोलते हैं. इफ़्तार के समय दुआ (दुआ) पढ़ना भी सुन्नत माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि इफ़्तार के दौरान की गई दुआ कबूल होने की संभावना ज़्यादा होती है.

